मेजर सुमन गावनी बनीं यूएन मिलिट्री जेंडर ऐडवोकेट ऑफ द ईयर अवॉर्ड की विजेता

भारतीय सेना की अधिकारी मेजर सुमन गावनी को यूएन मिलिट्री जेंडर ऐडवोकेट ऑफ द ईयर के अवॉर्ड (UN Military Gender Advocate of The Year) से सम्मानित किया गया। ऐसा पहली बार होगा जब किसी भारतीय शांति रक्षक को इस अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। सुमन गावनी संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत दक्षिण सूडान में तैनात थीं।
हाल ही में उन्होंने अपना मिशन पूरा किया है। उत्तराखंड मूल की सुमन के साथ सुमन के साथ ब्राजील सेना की एक कमांडर कर्ला मोंटेइरो डे कास्त्रो अराउजो को भी इस अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। अवॉर्ड के लिए दोनों का चुनाव करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने इन्हें प्रभावशाली आदर्श बताया।
पिछले 5 वर्षों से दिया जा रहा है यह अवॉर्ड
यूएन मिलिट्री जेंडर एडवोकेट अवॉर्ड की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी। यह अवार्ड उन सैन्य कर्मियों को दिया जाता है जो अपने काम से यूएन सिक्योरिटी रेजोल्यूशन-1325 के सिद्धांतों को मजबूती देते हैं और आगे बढ़ाते हैं।
31 अक्टूबर 2000 में यूएन ने सिक्योरिटी काउंसिल रेजोल्यूशन-1325 को अपनाया था। इसके अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के सभी शांति प्रयासों, संघर्षों को रोकने और संघर्ष के बाद के पुनर्निर्माण और तनावों की रोकथाम जैसे कार्यक्रमों में महिलाओं की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना है।
यूएन के शांति मिशनों में भारत तीसरा सबसे बड़ा भागीदार देश है
1950 से ही भारतीय सेना संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में हिस्सा लेती रही है। भारतीय सेना के जवान और यूनिट्स यूएन के 49 मिशनों में योगदान दे चुके हैं।
करीब 2 लाख से ज्यादा भारतीय सैनिक दुनियाभर में यूएन के अंतर्गत अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
वर्तमान में यूएन के शांति मिशनों में अपने सैनिक भेजने वाला भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है।
इंटरनेशनल डे ऑफ यूएन पीसकीपर्स
29 मई 1948 को संयुक्त राष्ट्र का पहला शांति मिशन शुरू हुआ था। अरब-इजराइल युद्ध में सीजफायर के बाद स्थिति की निगरीनी करने के लिए यूएन सुपरविजन ऑर्गनाइजेशन बनाया गया था।
इसी की याद में इंटरनेशनल डे ऑफ यूएन पीसकीपर्स हर साल 29 मई को मनाया जाता है। इस दिन हर साल यूएन के शांति मिशनों में काम कर रहे लोगों की मेहनत, साहस और लगन को सम्मान दिया जाता है।
यूएन के शांति मिशनों में जान गंवा चुके लोगों को भी याद किया जाता है। इस साल की थीम – शांति मिशनों में महिलाएं ही शांति की कुंजी थी।

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