आरक्षण का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है कानून है: सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने 11 जून को एक मामले की सुनवाई करते हुए व्यवस्था दी कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) उम्मीदवारों के लिए कोटा को लेकर दाखिल राजनीतिक दलों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कोई भी आरक्षण के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं कह सकता है। इसलिए कोटा का लाभ नहीं देना किसी संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। याचिका में कहा गया था कि तमिलनाडु में 50 प्रतिशत सीटों को स्नातक, स्नातकोत्तर चिकित्सा और दंत चिकित्सा 2020-21 के पाठ्यक्रमों के लिए अखिल भारतीय कोटा में तमिलनाडु में आरक्षित रखी जानी चाहिए। कोर्ट ने अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचारों के मूल अधिकार के उल्लंघन के तहत दायर याचिका को सुनने से इनकार कर दिया, और याचिकाकर्ताओं को हाइ कोर्ट जाने की राय दी।
अनुच्छेद 32-
नुच्छेद 32 संविधान के भाग तीन में वर्णित 6 मूल अधिकारों में से एक है। यह संवैधानिक उपचारों के अंतर्गत वर्णित है। संविधान द्वारा इसके तहत केवल मूल अधिकारों की सुरक्षा दी गई है अन्य अधिकारों की नहीं । यह अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में, अन्य मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए गारंटी प्रदान करता है, संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को इन अधिकारों के रक्षक के रूप में नामित किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के हनन में रिट जारी कर उनकी रक्षा करता है। जबकि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मूल अधिकारों के अलावा कानूनी अधिकार के उल्लंघन के संबंध में भी रिट जारी कर सकता है।

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