आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा, रेपो, रिवर्स रेपो, सीआरआर में कमी

COVID-19 महामारी के कारण संकट में आई भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत देने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट (Repo Rate) में 75 आधार अंकों की कटौती कर 4.4% कर दी है जबकि रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) में 90 आधार अंकों की कटौती करके 4% कर दी है। वहीं 28 मार्च से 1 वर्ष के लिये सभी बैंकों के नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio- CRR) को 100 आधार अंक घटाकर 3% कर दिया। जबकि सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility-MSF) 4.65% है। वहीं सांविधिक चलनिधि अनुपात (Statutory Liquidity Ratio-SLR) 18.25% है।
रेपो रेट (Repo Rate):
रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक से ऋण लेते हैं। रेपो दर में कटौती कर RBI बैंकों को यह संदेश देता है कि उन्हें आम लोगों और कंपनियों के लिये ऋण की दरों को आसान करना चाहिये।
रेपो रेट में कमी का असर
आरबीआई जब रेपो रेट में कटौती करता है तो प्रत्यक्ष तौर पर बाकी बैंकों पर वित्तीय दबाव कम होता है। आरबीआई की ओर से हुई रेपो रेट में कटौती के बाद बाकी बैंक अपनी ब्याज दरों में कटौती करते हैं। इसकी वजह से आपके होम लोन और कार लोन की ईएमआई में कमी आती है। रेपो रेट कम होता है तो महंगाई पर नियंत्रण लगता है। ऐसा होने से देश की अर्थव्यवस्था को भी बड़े स्तर पर फायदा मिलता है। ऑटो और होम लोन क्षेत्र को फायदा होता है। रेपो रेट कम होने से कर्ज सस्ता होता है और उससे होम लोन में आसानी होती है।
ऐसी कंपनियां जिन पर काफी कर्ज है उन्हें भी फायदा होता है क्योंकि रेपो रेट कम होने के बाद उन्हें पहले के मुकाबले कम ब्याज चुकाना होता है। आरबीआई के इस फैसले से प्राइवेट सेक्टर में इनवेस्टमेंट को बढ़ावा मिलता है।  इनफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ता है और सरकार को इस सेक्टर को मदद देने के लिए बढ़ावा मिलता है। रेपो रेट कम होता है तो कर्ज सस्ता होता है और इसके बाद कंपनियों को पूंजी जुटाने में और आसानी होती है। रेपो रेट के वढ़ने पर इसके विपरीत स्थितियां होती हैं।
रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate):
यह रेपो रेट के ठीक विपरीत होता है अर्थात् जब बैंक अपनी कुछ धनराशि को रिज़र्व बैंक में जमा कर देते हैं जिस पर रिज़र्व बैंक उन्हें ब्याज देता है। रिज़र्व बैंक जिस दर पर ब्याज देता है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।
जब भी बाज़ारों में बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दें। इस तरह बैंकों के कब्जे में बाजार में छोड़ने के लिए कम रकम रह जाएगी। लेकिन इसमें कमी करना तरलता बढ़ाने का उपाय है।
नकद आरक्षित अनुपात(Cash Reserve Ratio- CRR):
प्रत्येक बैंक को अपने कुल कैश रिज़र्व का एक निश्चित हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना होता है, जिसे नकद आरक्षित अनुपात कहा जाता है। ऐसा इसलिये किया जाता है जिससे किसी भी समय किसी भी बैंक में बहुत बड़ी तादाद में जमाकर्त्ताओं को यदि रकम निकालने की ज़रूरत महसूस हो तो बैंक को पैसा चुकाने में दिक्कत न आए।
अगर सीआरआर बढ़ता है तो बैंकों को ज्यादा बड़ा हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होगा और उनके पास कर्ज के रूप में देने के लिए कम रकम रह जाएगी। यानी आम आदमी को कर्ज देने के लिए बैंकों के पास पैसा कम होगा। अगर रिजर्व बैंक सीआरआर को घटाता है तो बाजार नकदी का प्रवाह बढ़ जाता है।
लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सीआरआर में बदलाव तभी किया जाता है, जब बाज़ार में नकदी की तरलता पर तुरंत असर न डालना हो, क्योंकि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव की तुलना में सीआरआर में किए गए बदलाव से बाज़ार पर असर ज्यादा समय में पड़ता है।
सीमांत स्थायी सुविधा.(Marginal Standing Facility-MSF):
आरबीआई ने पहली बार वित्त वर्ष 2011-12 में सालाना मॉनेटरी पॉलिसी रिव्यू में एमएसएफ का जिक्र किया था और यह 9 मई 2011 को लागू हुआ। इसमें सभी शेड्यूल कमर्शियल बैंक एक रात के लिए अपने कुल जमा का 1 फीसद तक लोन ले सकते हैं। बैंकों को यह सुविधा शनिवार को अलावा प्रत्येक कार्यदिवस में मिलती है।
सांविधिक चलनिधि अनुपात(Statutory Liquidity Ratio-SLR):
वाणिज्यिक बैंकों के लिये अपने प्रतिदिन के कारोबार के बाद नकद, सोना और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के रूप में एक निश्चित धनराशि रिज़र्व बैंक के पास रखना ज़रूरी होता है। इसका इस्तेमाल किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में किया जा सकता है। वह दर जिस पर बैंक यह धनराशि सरकार के पास रखते हैं उसे सांविधिक चलनिधि अनुपात (SLR) कहते हैं। इसके तहत अपनी कुल देनदारी के अनुपात में सोना सरकारी अनुमोदित बॉन्ड के रूप में रिज़र्व बैंक के पास रखना होता है।एसएलआर से बैंकों के कर्ज देने की क्षमता नियंत्रित होती है। अगर कोई बैंक मुश्किल परिस्थिति में फंस जाता है तो रिजर्व बैंक एसएलआर की मदद से ग्राहकों के पैसे की कुछ हद तक भरपाई कर सकता है।

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