कोडुमानल में उत्खनन

चर्चा में क्यों?

  • पुरातत्व विभाग, चेन्नई ने तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित कोडुमानल उत्तखनन स्थल (Kodumanal Excavation Site) से 250 केयर्न-सर्कल (cairn-circles ) की खोज की है।
  • केयर्न-सर्कल प्रागैतिहासिक पत्थर की पंक्ति हैं जो समानांतर मेगालिथिक खड़े पत्थरों की एक रैखिक व्यवस्था है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • कोडुमानल तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित एक गाँव है। यह कावेरी की सहायक नदी नॉयल नदी (Noyyal River) के उत्तरी तट पर स्थित है।
  • ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार एक समृद्ध व्यापारिक शहर था, जिसे कोडुमानम के नाम से जाना जाता था। इसका विवरण संगम साहित्य के पितृरूपथु (Patittrupathu) में मिलता है।
  • यह 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 1 शताब्दी ईसा पूर्व तक एक व्यापार-सह-औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित था।

उत्खनन के दौरान मिली वस्तुएं :

  • यह पहली बार है कि साइट से 10 बर्तन और कटोरे की खोज की गई है, अब तक तीन या चार बर्तन ही खुदाई में मिले हैं । यह तीन-कक्षीय कब्र के बाहर और केयर्न-सर्कल के अंदर रखा गए मिले हैं।
  • अधिक संख्या और बोल्डर के बड़े आकार से पता चलता है कि कब्र एक ग्राम प्रधान या समुदाय के प्रमुख की हो सकती है। यह प्रणाली महापाषाण संस्कृति (megalithic culture) में प्रचलित थी।
  • यह मेगालिथिक संस्कृति में मृत्यु के बाद अवधारणा का संकेत करता है, यह मानते हुए कि मृत व्यक्ति को मृत्यु के बाद एक नया जीवन मिलेगा इसलिए अनाज और अनाज से भरे कटोरे कक्षों के बाहर रखे जाते होंगे।
  • साइट से प्राप्त अन्य वस्तुओं में एक जानवर की खोपड़ी, मोती, तांबा गलाने वाली इकाइयां, एक कार्यशाला की मिट्टी की दीवारें, कुम्हार और तमिल ब्राह्मी लिपि की लिखावट शामिल हैं।

महापाषाणिक संस्कृति

  • लगभग 1000 ई. पूर्व से ईसवी सन् की आरंभिक सदियों तक दक्षिणी प्रायद्वीपीय उच्च भागों में महापाषाणिक संस्कृति का समय माना जाता है।
  • इसकी पहचान विशालकाय पत्थरों से घेरकर बनाई गई कब्रों यानी महापाषाण से होती है।
  • महापाषाणिक संस्कृति दक्षिण भारत में प्रागैतिहासिक युग से ऐतिहासिक युग में शुरुआत का समय था, जिसके कारण इसे महाद्वीपीय भारत के इतिहास का आधारात्मक चरण भी कहा जा सकता है।

प्रायद्वीपीय भारत में सबसे पहले महापाषाणिक लोगों ने ही लोहे का उपयोग एवं प्रसार किया।

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