कश्मीर घाटी में केसर की खेती को भौगोलिक संकेत टैग (Geographical indication) प्रदान किया गया है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में गोरखपुर टेराकोटा, कोविलपट्टी कदलाई मितई (तमिलनाडु की मूंगफली और गुड़ की बनी कैंडी या चिक्की)और मणिपुर के काले चावल जैसे तीन अन्य उत्पादों को भी जीआई टैग प्राप्त हुआ था।
कश्मीर में उगाया जाने वाला केसर लम्बा, मोटा और गहरे लाल रंग का होता है। इसके अलावा, इसमें काफी सुगंध होती है और इसे किसी भी रसायन को  के बिना प्रोसेस किया जाता है। क्रोसिन की उच्च मात्रा के कारण केसर का रंग अद्वितीय है।
कश्मीरी केसर की विशेषता
कश्मीरी केसर दुनिया का एकमात्र केसर है जो 1,600 मीटर की ऊंचाई पर उगाया जाता है। यह पुलवामा, किश्तवाड़, बडगाम और श्रीनगर के क्षेत्रों में उगाया जाता है।
इस केसर की तीन प्रजातियां उपलब्ध है, लच्छा केसर जो केवल फूल से अलग होता है और प्रसंस्करण के बिना सूख जाता है। मोंगरा केसर जिसे फूल से अलग किया जाता है, पारंपरिक रूप से सुखाया जाता है और संसाधित किया जाता है। गुच्छी केसर जो सूखे और एयर टाइट कंटेनर में पैक किया जाता है।
क्या है जीआई टैग?

  • भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) संकेत है जिसका उपयोग उन उत्पादों पर किया जाता है जिनकी एक विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति होती है ।
  • इन उत्पादों की विशेषता और पहचान भी इसी मूल क्षेत्र के कारण होती है। साथ ही जीआई टैग किसी उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी अलग पहचान का सबूत है।
  • जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिये पेरिस कन्वेंशन (Paris Convention for the Protection of Industrial Property) के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर GI का विनियमन विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं (Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights-TRIPS) पर समझौते के तहत किया जाता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर यह कार्य ‘वस्तुओं का भौगोलिक सूचक’ (पंजीकरण और सरंक्षण) अधिनियम, 1999 (Geographical Indications of goods ‘Registration and Protection’ act, 1999) के तहत किया जाता है, जो सितंबर 2003 से लागू हुआ।
  • वर्ष 2004 में ‘दार्जिलिंग टी’ जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला भारतीय उत्पाद है। भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण 10 वर्ष के लिये मान्य होता है।

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