भारत का ब्रिटेन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दूसरे स्थान पर

चर्चा में क्यों?

  • भारत ब्रिटेन में प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश (Foreign direct investment – FDI) के माध्यम से निवेश करने वाला दूसरा सबसे बड़ा निवेशक बन गया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • ब्रिटेन सरकार के आंतरिक व्यापार विभाग के 10 जुलाई 2020 को जारी आंकड़ों के अनुसार देश में 2019-20 में आए एफडीआई में भारत तीसरे स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।
  • भारतीय निवेशकों ने 2019 में यहां 120 परियोजनाओं में निवेश किया और 5,429 नए रोजगार के अवसरों का सृजन किया।
  • आंकड़ों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ब्रिटेन में 462 परियोजनाओं में निवेश किया और 20,131 रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराए, जिसके साथ वह ब्रिटेन में एफडीआई में निवेश करने वाला सबसे बड़ा देश है।
  • उसके बाद क्रमश: भारत, जर्मनी, फ्रांस, चीन और हांगकांग का स्थान रहा। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने 72 परियोजनाओं में निवेश किया। नार्डिक और बाल्टिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 134 रही।

क्या होता है प्रत्य़क्ष विदेशी निवेश?
विदेशी निवेश के निम्नलिखित दो रूप हैं-
1-प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment- FDI):

  • सामान्य शब्दों में किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई कहलाता है।
  • ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है जिसमें उन्होंने निवेश किया है।
  • आमतौर पर माना यह जाता है कि किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10 फीसदी शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है।

2-विदेशी संस्थागत निवेश ( Foreign institutional investment):

  • एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशक शेयरों, म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं।
  • एफआईआई पार्टिसिपेटरी नोट, सरकारी प्रतिभूतियों, कमर्शियल पेपर वगैरह को निवेश माध्यम बनाते हैं।
  • ज्यादातर एफडीआई की प्रकृति स्थायी होती है लेकिन बाजार में उथल-पुथल की स्थिति बनने पर एफआईआई जल्दी से बिकवाली कर निकल जाते हैं।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी संस्थागत निवेश की तुलना में बेहतर माने जाते हैं क्योंकि FDI किसी देश की अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करते हैं जबकि FiI निवेश अस्थिर प्रकृति के होते हैं और इनमें संकट की स्थिति में अर्थव्यवस्था से निकल जाने की प्रवृति देखी जाती है।

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