Daily Current Affairs 27 November 2020

राष्ट्रीय परिदृश्य
ट्रांसजेंडर लोगों के लिए राष्ट्रीय पोर्टल
चर्चा में क्यों?
भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने 27 नवंबर 2020 को ‘ट्रांसजेंडर लोगों के लिए नेशनल पोर्टल’ का ई-शुभारंभ किया है।
महत्वपूर्ण बिंदु
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020 की अधिसूचना के अंतर्गत ‘ट्रांसजेंडर लोगों के लिए राष्ट्रीय पोर्टल’ (National Portal for Transgender Persons) को विकसित किया गया है।
इस अवसर पर गुजरात के वडोदरा के एक ‘गरिमा गृह: ए शेल्टर होम फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स’ (Garima Greh: A Shelter Home for Transgender Persons) का भी ई-उद्घाटन किया गया है।
यह अत्यधिक उपयोगी पोर्टल देश में कहीं से भी एक ट्रांसजेंडर को प्रमाण पत्र और पहचान पत्र के लिए डिजिटल रूप से आवेदन करने में मदद करेगा
‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आश्रय गृह’ योजना में आश्रय सुविधा, भोजन, कपड़े, मनोरंजन सुविधाएं, कौशल विकास के अवसर, योग, ध्यान/प्रार्थना, शारीरिक फिटनेस, पुस्तकालय सुविधाएं, कानूनी सहायता, लिंग परिवर्तन और सर्जरी के लिए तकनीकी सलाह, ट्रांस-फ्रेंडली संगठनों के लिए क्षमता निर्माण, रोजगार और कौशल-निर्माण सहायता आदि शामिल हैं।
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चर्चित व्यक्ति
गौरव शर्मा
चर्चा में क्यों?
न्यूजीलैंड के सबसे युवा व नवनिर्वाचित सांसद डॉ. गौरव शर्मा ने 25 नवंबर 2020 को देश की संसद में संस्कृत में शपथ ली है।
महत्वपूर्ण बिंदु
33 वर्षीय डॉ. गौरव शर्मा मूल रूप से हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश) के रहने वाले हैं और हाल ही में न्यूजीलैंड में हैमिल्टन वेस्ट के लिए उन्हें लेबर पार्टी से संसद सदस्य के रूप में चुना गया है।
डॉ. गौरव शर्मा ने सबसे पहले न्यूजीलैंड की स्वदेशी माओरी भाषा में शपथ ली, उसके बाद भारत की शास्त्रीय भाषा- संस्कृत, में शपथ लेकर उन्होंने भारत और न्यूजीलैंड दोनों की सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान दिखाया।
उन्होंने ऑकलैंड से एमबीबीएस किया और वाशिंगटन से एमबीए किया है और वे हैमिल्टन के नवाटन में जनरल प्रैक्टिशनर के रूप में कार्यरत हैं।
वे पूर्व में न्यूजीलैंड, स्पेन, अमेरिका, नेपाल, वियतनाम, मंगोलिया, स्विट्जरलैंड और भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य, नीति, चिकित्सा और परामर्श में शामिल रह चुके हैं।
डॉ. गौरव शर्मा अपने परिवार के साथ 1996 में न्यूजीलैंड चले गए थे। उनके पिता को छह साल तक यहां नौकरी नहीं मिली। परिवार ने बड़ी मुश्किल से वक्त गुजारा। उनका कहना है कि वह समाजसेवा के लिए राजनीति में हैं क्योंकि उनका परिवार बहुत ही कष्टों से गुजरा है।
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समारोह/सम्मेलन
पीठासीन अधिकारियों का वार्षिक सम्मेलन
चर्चा में क्यों?
पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन का आयोजन 25 व 26 नवम्बर 2020 को गुजरात के केवड़िया में हुआ।
महत्वपूर्ण बिंदु
इस सम्मेलन को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया।
‘सशक्त लोकतंत्र के लिए विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका का आदर्श समन्वय’’ इस सम्मेलन का मुख्य विषय रखा गया था।
सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों की विधायिकाओं के विधानसभा/ विधान परिषद के अध्यक्षों ने भाग लिया।
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अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य
म्यांमार में आम चुनाव
चर्चा में क्यों?
म्यांमार में हाल में हुए आम चुनाव में आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) पार्टी की फिर जीत हुई है।
महत्वपूर्ण बिंदु
नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने कहा है कि उसने संसदीय चुनाव में अभूतपूर्व जीत दर्ज की है।
म्यांमार में नवंबर में संसदीय चुनाव हुए थे।
उल्लेखनीय है कि 2015 के चुनाव में भी एनएलडी ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की थी।
इस चुनाव में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया, जिसकी आलोचना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई। नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने 642 में से कुल 396 सीटें हासिल कीं, जो वर्ष 2015 की 390 सीटों की तुलना में अधिक है।
पार्टी ने म्यांमार के निचले सदन पाइथु ह्लुटाव (Pyithu Hluttaw) में 258 सीटें और ऊपरी सदन – अम्योथा ह्लुटाव (Amyotha Hluttaw) में 138 सीटों पर जीत हासिल की।
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल – सैना-समर्थित यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) केवल 33 सीटें जीतने में कामयाब रही।
2015 में हुआ था सैन्य शासन का अंत
शांति का नोबेल जीतने वाली सूची की पार्टी ने 2015 चुनाव में जीत हासिल की थी और इसी के साथ देश से 50 साल के सैन्य शासन का अंत हुआ था।
चुनाव तो जीतीं लेकिन साख गिरी सू ची की
एक समय में आंग सांग सू ची को क्षेत्र में लोकतंत्र की सबसे मजबूत नेता के तौर पर देखा जाता था। लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों के साथ देश में संकट को संभाल पाने में नाकाम होने पर उनकी साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिरी है।
2020 के चुनावों में मुख्य चिंता का विषय उन रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर था, जिनको वोट देने के लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को रोहिंग्या और अन्य जातीय लोगों से अधिकार छीने जाने की निंदा करनी चाहिए और भविष्य में ऐसा ना हो इसको सुनिश्चित करना चाहिए।
मगर एनएनडी की जीत का आधार शायद यही है कि उसने रोंहिग्य मुद्दे पर बहुसंख्यक समुदाय को ध्रुवीकृत कर लिया।
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भारत एवं विश्व
भारत और फिनलैंड के बीच पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग
चर्चा में क्यों?
भारत और फिनलैंड ने 26 नवंबर 2020 को पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग विकसित करने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।
यह एमओयू भारत और फिनलैंड के बीच साझेदारी और समर्थन को आगे बढ़ाने का एक मंच है।
इस एमओयू के तहत वायु और जल प्रदूषण की रोकथाम जैसे क्षेत्रों में एक दूसरे का सहयोग शामिल है।
इसके माध्यम से दोनों देश वायु और जल प्रदूषण की रोकथाम जैसे क्षेत्रों में उच्च साधनों और रणनीति का आदन प्रदान करेंगे।
यह समझौता भूविज्ञान, प्रशिक्षण, खनिज पूर्वानुमान, भूकंपीय और अन्य भूभौतिकीय सर्वेक्षणों के लिए भारत और फिनलैंड के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत बनाएगा।
इस समझौता का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के लिए भूवैज्ञानिक आंकड़ा प्रबंधन और सूचना प्रसार पर अनुभव साझा करने के लिए परस्पर सहयोग को बढ़ावा देने को लेकर नियम और मंच उपलब्ध कराना है।
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आर्थिक एवं वाणिज्यिक परिदृश्य
RBI की आंतरिक कार्य समूह की रिपोर्ट
चर्चा में क्यों?
इस आंतरिक कार्य समूह (IWG) का गठन देश के निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए मौजूदा स्वामित्व दिशा-निर्देशों और कॉरपोरेट संरचना की समीक्षा करने के लिए किया गया था।
महत्वपूर्ण बिंदु
इसमें सुझाव दिया गया है कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में आवश्यक संशोधन के बाद बड़े कॉरपोरेट/ औद्योगिक घरानों को बैंकों के प्रवर्तकों के रूप में अनुमति दी जा सकती है।
इसका मतलब ये है कि अडानी, अंबानी, टाटा, पिरामल और बजाज जैसे बड़े कॉरपोरेट घराने बैंक के लिए लाइसेंस ले सकते हैं और अगर वो उपयुक्त पाए जाते हैं तो वो बैंक भी खोल सकते हैं।
आंतरिक कार्य समूह की रिपोर्ट कहती है, ”1947 में भारत की आज़ादी के समय व्यावसायिक बैंक (इनमें से कई बैंक कारोबारी घरानों के नियंत्रण में थे) सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने में पिछड़ गए थे. इसलिए, भारत सरकार ने 1969 में 14 और 1980 में छह बड़े व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।”
रिपोर्ट में इस तथ्य पर भी विचार किया गया है कि ”भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी वृद्धि हुई है लेकिन भारत में बैंकों की कुल बैलेंस शीट अब भी जीडीपी के 70 फ़ीसद से कम है, जो कि वैश्विक स्तर पर मौजूद समकक्षों के मुक़ाबले बहुत कम है, वो भी एक बैंक-प्रभुत्व वाली वित्तीय प्रणाली के लिए।”
पूर्व गवर्नर और डिप्टी गवर्नर ने उठाए सवाल
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम जी राजन और विरल आचार्य ने एक संयुक्त पोस्ट में कहा है, अगर ऐसा करने की अनुमति दी जाती है तो आर्थिक ताक़त कुछ ही कॉरपोरेट्स के हाथों में सिमट कर रह जाएगी।
इन कॉरपोरेट्स को ख़ुद भी वित्तपोषण की ज़रूरत होती है और ऐसे में वो अपने ही बैंकों से जब चाहे आसानी से पैसा निकाल लेंगे। उनसे सवाल करना बहुत मुश्किल होगा। ये ऋण की बुरी स्थिति की ओर ले जाएगा।
राजन और आचार्य ने लिखा है, ”ऐसे जुड़े हुए ऋणों का इतिहास बेहद विनाशकारी रहा है। जब क़र्ज़दार ही बैंक का मालिक होगा, तो ऐसे में बैंक ठीक से ऋण कैसे दे पाएंगे?
दुनियाभर की सूचनाएं पाने वाले एक स्वतंत्र और प्रतिबद्ध नियामक के लिए भी ख़राब क़र्ज़ वितरण पर रोक लगाने के लिए हर जगह नज़र रखना मुश्किल होता है।
ऋण प्रदर्शन को लेकर जानकारी शायद ही कभी समय पर आती है या सटीक होती है. यस बैंक अपने कमज़ोर ऋण जोखिमों को काफ़ी समय तक छुपाने में कामयाब रहा था।”
नियामक इन संस्थाओं के कारण भारी राजनीतिक दबाव में भी आ सकता है।
इसके अलावा, अत्यधिक ऋणग्रस्त और राजनीति से जुड़े व्यावसायिक घरानों के पास लाइसेंस के लिए ज़्यादा ज़ोर लगाने की क्षमता होगी. इससे हमारी राजनीति में पैसे की ताक़त का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा।
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