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Daily Current Affairs: 25 August 2021

भारत एवं विश्व

ऑपरेशन देवी शक्ति

चर्चा में क्यों?

  • अफगानिस्तान से भारतीय नागरिकों और अफगान सहयोगियों को सुरक्षित लाने के भारत के जटिल मिशन का नाम ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ रखा गया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • पौराणिक कथाओं में जिस तरह मां दुर्गा ने जिस तरह से बेगुनाह लोगों की राक्षसों से रक्षा की थी, उसी प्रकार तालिबान से बेगुनाह नागरिकों को बचाने को प्रयास भारत सरकार कर रही है, इसलिए इस ऑपरेशन का नाम ‘देवी शक्ति’ रखा गया है।
  • विदेश मंत्रालय के अनुसार ‘ऑपरेशन देवी शक्ति जारी है। काबुल से 78 लोगों को दुशांबे के रास्ते लाया गया।
  • बता दें कि भारत ने 16 अगस्त को काबुल से 40 भारतीयों को विमान से दिल्ली लाकर लोगों को सुरक्षित लाने के जटिल मिशन की शुरुआत की थी।

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पैरालंपिक खेल 2020 का शुभारंभ

चर्चा में क्यों?

  • जापान की राजधानी टोक्यो में ओलंपिक के बाद अब 16 वें पैरालंपिक खेलों की शुरुआत हो गई है। ये खेल 24 अगस्त से 5 सितंबर 2021 तक आयोजित होंगे।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • उदघाटन समारोह के मार्च पास्ट में सबसे पहले जापान के खिलाड़ियों का दल स्टेडियम में आया। भारतीय दल ने 17वें नंबर पर अपना मार्च पास्ट किया।
  • भालाफेंक खिलाड़ी टेकचंद भारतीय दल के ध्वजवाहक रहे।
  • भारत ने इन खेलों में अब तक 12 मेडल जीते हैं जिसमें चार गोल्ड, चार सिल्वर और इतने की ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं।
  • भारत ने 1972 में पहली बार पैरालंपिक खेलों में हिस्सा लिया था।
  • इस बार 54 खिलाड़ियों का दल भारत की तरफ से गया है, जो अबतक का सबसे बड़ा दल है।
  • टोक्यो 2 बार समर पैरालिंपिक गेम्स होस्ट करने वाला पहला शहर है। इससे पहले 1964 में भी टोक्यो ने इन गेम्स की मेजबानी की थी।
  • इस बार पैरालिंपिक्स में रिकॉर्ड 4537 खिलाड़ी शामिल होंगे। इसका पिछला रिकॉर्ड 4328 खिलाड़ियों के भाग लेने का था, जो रियो 2016 में बना था। 13 दिनों के दौरान 22 खेलों के कुल 539 इवेंट होंगे।
  • पैरालंपिक खेलों की शुरुआत 1960 में रोम ओलंपिक खेलों के साथ हुई थी।

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राष्ट्रीय परिदृश्य

देवदासी प्रथा अब भी जारी

चर्चा में क्यों?

  • कर्नाटक के कई हिस्सों में सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं के चलते आज भी देवदासी कुप्रथा जारी है।
  • इस साल फरवरी में 22 साल की युवती ने देवदासी बनने से बचने के लिए देवदासी निर्मूलन केंद्र से मदद मांगी थी। इससे प्रशासन हरकत में आया और उसे देवदासी बनने से बचा लिया गया था।

क्या है देवदासी प्रथा?

  • यह प्रथा धार्मिक परंपरा से जुड़ी है। किसी लड़की को देवदासी प्रथा में डाला जाता है तो इसकी शुरुआत मारम्मा मंदिर में पूजा-पाठ, अनुष्ठान और देवदासी लड़की के द्वारा प्रस्तुत नृत्य और गीत से होती है।
  • मंदिर को समर्पित किए जाने और देवता से शादी के बाद वो बिना किसी भविष्य के उच्च जातियों के पुरुषों की सेवा के लिए उनकी सेक्स गुलाम या बंधुआ बन जाती हैं।
  • बीते कुछ सालों से प्रशासन ने इस तरह के रीति -रिवाज के पालन पर रोक लगाई है। लेकिन जिले के कुछ मंदिरों में चोरी-छिपे यह प्रथा बदस्तूर जारी है।
  • रिपोर्ट के अनुसार 90% देवदासी अनुसूचित जनजाति से ही आती हैं। ब्राह्मण और उच्च जातियों की लड़कियां देवदासी नहीं बनाई जाती।
  • राज्य सरकार द्वारा 2008 में किए गए सर्वे और कर्नाटक राज्य महिला विकास निगम के आकंड़ों में देवदासियों की संख्या करीब 40,600 है।
  • पर 2018 में एक विदेशी गैर सरकारी संस्था और और कर्नाटक राज्य महिला विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन में कर्नाटक में 90 हजार देवदासियां पाई गईं, जिसमें से उत्तरी कर्नाटक की 20% से ज्यादा देवदासी 18 वर्ष से कम उम्र की हैं।
  • देवदासी प्रथा की शुरुआत छठवीं और सातवीं शताब्दी के आसपास हुई थी। इस प्रथा का प्रचलन मुख्य रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में था। दक्षिण भारत में खासतौर पर चोल, चेला और पांड्याओं के शासन काल में ये कुप्रथा खूब फली फूली।
  • इस प्रथा के अनुसार, एक बार देवदासी बनने के बाद ये बच्चियाँ न तो किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर सकती है और न ही सामान्य जीवन व्यतीत कर सकती है।

देवदासी प्रथा के ख़िलाफ़ क़ानून

  • मद्रास विधान परिषद की पहली महिला उपाध्यक्ष मुथुलक्ष्मी रेड्डी देवदासी प्रथा को ख़त्म करने के लिए क़ानून पास करवाने में अगुआ रहीं।
  • उन्हें इस प्रक्रिया में भी कट्टर समूहों से विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस प्रस्ताव को मद्रास विधान परिषद ने सर्वसम्मति से समर्थन दिया और केंद्र सरकार को इसकी सिफारिश की। ये विधेयक 1947 में आखिरकारी क़ानून बन गया।

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चकमा-हाजोंग समुदाय को निर्वासित करने पर आक्रोश

चर्चा में क्यों?

  • चकमा डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (CDFI) ने 60,000 से अधिक चकमाओं और हाजोंगों को अन्य राज्यों में निर्वासित करने के प्रस्ताव पर अरुणाचल प्रदेश सरकार के प्रति रोष प्रकट किया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • CDFI के एक ज्ञापन में कहा कि अरुणाचल में 60,000 चकमा और हाजोंग में से प्रदेश, लगभग “94% जन्म से भारतीय नागरिक हैं”।
  • CDFI के अनुसार चकमास और हाजोंग्स और पूर्व-असम राइफल्स के जवानों को 1964 से 1968 तक भारत की रक्षा के लिए तत्कालीन केंद्र प्रशासित नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) में बसाया गया था।
  • दरअसल चकमा बौद्ध हैं, जबकि हाजोंग हिन्दू हैं।
  • ये जातीय लोग हैं जो चटगाँव पहाड़ी क्षेत्रों में रहते थे, इनमें से अधिकांश क्षेत्र बांग्लादेश में स्थित हैं।
  • ये लोग पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और म्याँमार में निवास करते हैं।
  • ये 1964-65 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आ गए तथा अरुणाचल प्रदेश में बस गए।
  • चकमास ने बांग्लादेश के कर्नाफुली (Karnaphuli) नदी पर बनाए गए कैपटाई बाँध (Kaptai dam) के कारण अपनी भूमि खो दी।
  • हाजोंग लोगों को धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा क्योंकि वे गैर-मुस्लिम थे और बांग्ला भाषा नहीं बोलते थे।
  • 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को उन चकमा और हाजोंग्स को नागरिकता देने का निर्देश दिया, जो 1964-69 के बीच बांग्लादेश से भारत आए थे।

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चर्चित स्थान

शत्रुंजय हिल्स

चर्चा में क्यों?

  • शत्रुंजय शिखर के संबंध में गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि यह जैनों का अति पवित्र यात्राधाम है। इसे स्वच्छ और व्यवस्थित रखने का कार्य जैन ट्रस्टों द्वारा किया जा रहा है। इसकी तलहटी से लेकर शिखर तक किसी प्रकार का अतिक्रमण न हो, यह देखना सरकार की जिम्मेदारी है।
  • कोर्ट ने कहा है कि अवैध कब्जा हुआ है, तो उसे तुरंत हटाया जाए। हाईकोर्ट ने ब्राह्मणों के ही महादेव मंदिर में पुजारी बनने की दलील को भी खारिज कर दिया। पीठ ने ताकीद की कि ऐसा कोई नियम हो तो सरकार को इसके लिए जैन ट्रस्ट के साथ चर्चा करनी होगी।
  • पालीताणा में विराजित शत्रुंजय शिखर पर 815 मंदिर हैं। इसकी यात्रा मोक्षदायी मानी जाती है।
  • 1900 फुट की ऊंचाई पर शत्रुंजय शिखर पर विराजित आदिनाथजी के दर्शन के लिए 3,745 सीढ़ियां चढ़कर जाना होता है। यह सीढ़ियां 13वीं सदी में बनाई गई थी।

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आर्थिक एवं वाणिज्यिक परिदृश्य

मदुर मैट को राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में पश्चिम बंगाल की दो महिलाओं को शिल्प के विकास में उनके उत्कृष्ट योगदान और ‘मदुर फ्लोर मैट’ के निर्माण के लिये राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार दिया गया।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • शिल्प गुरु पुरस्कार, राष्ट्रीय पुरस्कार और राष्ट्रीय उत्कृष्टता प्रमाणपत्र देश के हस्तशिल्प कारीगरों के लिये सर्वोच्च पुरस्कारों में से हैं।
  • इन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।
  • शिल्प गुरु पुरस्कार भारत में हस्तशिल्प पुनरुत्थान के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर वर्ष 2002 में स्थापित किया गया था।
  • जबकि राष्ट्रीय पुरस्कार वर्ष 1965 में और राष्ट्रीय उत्कृष्टता प्रमाणपत्र वर्ष 1967 में स्थापित किया गया था।
  • शिल्प गुरु हस्तशिल्प के क्षेत्र में 20 वर्ष के अनुभव वाले 50 वर्ष से अधिक आयु के कारीगरों को दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च पुरस्कार है।
  • इसी प्रकार शिल्प के विकास में उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देने के लिये 30 वर्ष से अधिक आयु के शिल्पकार, जो हस्तशिल्प के क्षेत्र में 10 वर्ष का अनुभव रखता है, को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
  • राष्ट्रीय उत्कृष्टता प्रमाणपत्र उन मास्टर शिल्पकारों, जो 30 वर्ष से अधिक आयु के हैं और हस्तशिल्प के क्षेत्र में 10 वर्ष का अनुभव रखते हैं, को शिल्प को बढ़ावा देने के लिये किये गए उनके कार्य, उसके प्रसार और कौशल स्तर को मान्यता प्रदान करने के लिये दिया जाता है ।

मदुर फ्लोर मैट:

  • बंगाली जीवनशैली का एक आंतरिक हिस्सा, मदुर मैट या मधुरकथी प्राकृतिक रेशों से बने होते हैं।
  • इसे अप्रैल 2018 में जीआई रजिस्ट्री द्वारा भौगोलिक संकेत (GI Tag) टैग से सम्मानित किया गया था।
  • यह एक प्रकंद आधारित पौधा (साइपरस टेगेटम या साइपरस पैंगोरेई) है जो पश्चिम बंगाल के पुरबा और पश्चिम मेदिनीपुर के जलोढ़ इलाकों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

बंगाल के जीआई टैग वाले अन्य उत्पाद:

  • कुष्मंडी का लकड़ी का मुखौटा, पुरुलिया चौ-मुखौटा, गोविंदभोग चावल, तुलापंजी चावल, बंगाल पटचित्र, दार्जिलिंग चाय आदि।

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