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Daily Current Affairs: 19 August 2021

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य

अफगानिस्तान पर फिर से तालिबान का कब्जा

चर्चा में क्यों?

  • अफगानिस्तान में दो दशक तक चले युद्ध के पश्चात अमेरिकी सैनिकों की वापसी हो गई है, इसके साथ ही तालिबान ने आगे बढ़कर देश की राजधानी काबुल पर अधिकार जमा लिया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • उल्लेखनीय है कि 1 मई से अमेरिकी सैनिकों की वापसी शुरू हुई और उसके बाद से तालिबान भी सक्रिय हो गया। उसने एक-एक कर बड़े शहरों को अपने कब्जे में किया और काबुल पर कब्जे के साथ पूरे देश को अपने अधिकार में ले लिया।
  • अमेरिका और उसके मित्र देशों ने अफगानिस्तान में जो सेना खड़ी की थी और करोड़ों डॉलर खर्च कर सैनिक साजो-सामान से उन्हें लैस किया था वह सब बेकार हो गया।

कौन है तालिबान?

  • तालिबान एक उग्रवादी समूह है जो अफगानिस्तान के कंधार शहर में शुरु हुआ और पूरे देश में फैल गया।
  • इसने ही 1990 के दशक के आखिर में देश पर शासन किया था। अफगानिस्तान में अब वह दोबारा बड़ी ताकत बनकर उभरा है और उसने देश पर काबू कर लिया है।

अमेरिका ने सत्ता से बेदखल किया था तालिबान को

  • अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों पर आतंकी हमलों के खिलाफ वॉर ऑन टेरर शुरू किया था। हमले के लिए जिम्मेदार अल-कायदा पर तालिबान ने कार्रवाई नहीं की। और तो और, उसे बचा रखा था। इससे भड़के अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया था। कुछ ही महीनों में तालिबान के लड़ाकों को देश से खदेड़ दिया था। इसके बाद अमेरिका के लिए लगातार युद्ध लड़ना और देश का पुनर्निर्माण करना बेहद मुश्किल साबित हुआ।

अफगानिस्तान की सेना ने तालिबान का सामना क्यों नहीं किया?

  • इसका संक्षेप में जवाब है- भ्रष्टाचार। तभी तो 70-80 हजार लड़ाकों वाला तालिबान 3 लाख सैनिकों की अफगानिस्तान सेना पर भारी पड़ा।
  • अमेरिका और नाटो सहयोगियों ने दो दशक में अरबों डॉलर खर्च किए ताकि अफगान सुरक्षा बलों को ट्रेनिंग दी जा सके। उन्हें अत्याधुनिक हथियार दिए जा सकें। इसके बाद भी पश्चिमी देशों के समर्थन से बनी सरकार ने बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार किया।
  • कमांडरों ने विदेशी पैसे का फायदा उठाया और सैनिकों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताई। मैदानी सिपाही हथियारों, गोला-बारूद और यहां तक कि खाने के लिए भी तरसते रहे।
  • जब अमेरिका ने सैनिकों को वापस बुलाने के प्लान पर अमल शुरू किया तो अफगानिस्तानी सेना का हौसला पस्त हो गया।
  • तालिबान के आगे बढ़ते ही अफगान सैनिक समर्पण करते चले गए। काबुल जैसे बड़े शहर तो बिना संघर्ष के ही तालिबान ने हथिया लिए।

भारत पर प्रभाव

  • माना जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता आने के साथ ही दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव आ गया है। इसके साथ ही भारत के लिए अब स्थिति पहले से अधिक मुश्किल हो गई है।
  • अमेरिका या फिर रूस के मुक़ाबले अफ़ग़ानिस्तान में भारत कभी भी बड़ा खिलाड़ी नहीं रहा है। लेकिन दक्षिण एशिया के पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने में भारत की हमेशा से अहम भूमिका रही है। हज़ारों की संख्या में अफ़ग़ान नागरिक पढ़ाई करने, इलाज कराने या काम के लिए भारत आते हैं।
  • जानकार मानते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये होने वाली है कि वो तालिबान सरकार को मान्यता दे या नहीं।
  • इसके अलावा भारत सरकार ने अफगानिस्तान के पुनरिनिर्माण में जो अरबों डालर का निवेश किया है, वहां की संसद भवन बनवाया है, पुल, बांध और सड़कें बनवाई हैं उनके निष्फल होने का भी संकट पैदा हो गया है।
  • अगर रूस और चीन तालिबान को मान्यता देने पर राज़ी हो जाते हैं, तो भारत के लिए स्थिति बेहद मुश्किल हो सकती है। जानकार मानते हैं कि साल 1999 की तरह पाकिस्तान इस बार भी आधिकारिक तौर पर तालिबान सरकार को मान्यता दे सकता है।
  • फ़िलहाल भारत के लिए बेहतर रास्ता यही है कि वो तालिबान के साथ चर्चा का एक रास्ता खुला रखे।

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स्वास्थ्य एवं पोषण

कर्नाटक में मिला कोरोना का ईटा वैरियंट

  • कर्नाटक के मेंगलुरू में हाल ही में कोरोना का ईटा वैरिएंट (Eta Variant of Coronavirus) मिला है। दुबई से आए व्यक्ति में यह वैरिएंट मिला है। इससे पहले अप्रैल 2020 में भी निमहांस के वायरोलॉजी लैब ने ईटा वैरिएंट के दो केस मिलने का दावा किया था।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • WHO ने इसे वैरिएंट ऑफ इंटरेस्ट (VoI) माना है। यानी वो वैरियंट जो तेजी से फैलते हैं, गंभीर लक्षण दिखाते हैं और एंटीबॉडी को भ्रमित करने में सक्षम होते हैं।
  • अब तक भारत में अल्फा और डेल्टा वैरिएंट ही हावी रहे हैं। दूसरी लहर के लिए तो डेल्टा वैरिएंट को ही जिम्मेदार माना गया है।

ये वैरिएंट्स क्या हैं और इनसे क्या खतरा है?

  • विशेषज्ञों के मुताबिक वायरस में म्यूटेशन कोई नई बात नहीं है। यह स्पेलिंग मिस्टेक की तरह है। वायरस लंबे समय तक जीवित रहने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इन्फेक्ट करने के लिए जीनोम में बदलाव करते हैं। ऐसे ही बदलाव कोरोना वायरस में भी हो रहे हैं।
  • वायरस जितना ज्यादा मल्टीप्लाई होता है, उसमें म्यूटेशन होते जाएंगे। जीनोम में होने वाले बदलावों को ही म्यूटेशन कहते हैं। इससे नए और बदले रूप में वायरस सामने आता है, जिसे वैरिएंट कहते हैं।
  • WHO की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि वायरस जितने समय तक हमारे बीच रहेगा, उतने ही उसके गंभीर वैरिएंट्स सामने आने की आशंका बनी रहेगी। अगर इस वायरस ने जानवरों को इन्फेक्ट किया और ज्यादा खतरनाक वैरिएंट्स बनते चले गए तो इस महामारी को रोकना बहुत मुश्किल होने वाला है।

क्या सभी वैरिएंट्स खतरनाक होते हैं?

  • नहीं। वैरिएंट ज्यादा या कम खतरनाक हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके जेनेटिक कोड में किस जगह म्यूटेशन हुआ है। म्यूटेशन ही तय करता है कि कोई वैरिएंट कितना इंफेक्शियस है? वह इम्यून सिस्टम को चकमा दे सकता है या नहीं? वह गंभीर लक्षणों की वजह बन सकता है या नहीं?
  • उदाहरण के लिए अल्फा वैरिएंट ओरिजिनल वायरस से 43% से 90% तक ज्यादा इंफेक्शियस है।
  • अल्फा वैरिएंट की वजह से गंभीर लक्षण भी दिखे और मौतें भी हुईं। जब डेल्टा वैरिएंट सामने आया तो यह अल्फा वैरिएंट से भी ज्यादा इंफेक्शियस निकला। अलग-अलग स्टडी में यह ओरिजिनल वायरस के मुकाबले 1000 गुना ज्यादा इंफेक्शियस मिला है।

ईटा वैरिएंट क्या है?

  • ईटा वैरिएंट को लाइनेज 1.525 भी कहा जाता है। SARS-CoV-2 वायरस के ईटा वैरिएंट में E484K म्यूटेशन मौजूद है, जो इससे पहले गामा, जीटा और बीटा वैरिएंट्स में मिला था। अच्छी बात यह है कि अल्फा, बीटा, गामा में मौजूद N501Y म्यूटेशन इसमें नहीं हैं, जो इन वैरिएंट्स को खतरनाक बनता है।
  • रिपोर्ट्स के मुताबिक अल्फा वैरिएंट की तरह इसमें भी पोजिशन 69 और 70 पर अमीनो एसिड्स हिस्टिडिन और वैलाइन मौजूद नहीं है।

कोरोना का कौनसा वैरियंट कहां मिला?

डेल्टा वैरियंट

  •  कोरोना वायरस का डेल्टा वैरियंट सबसे पहले भारत में पाया गया था। इसे B.1.617.2 के वैज्ञानिक नाम से भी जाना जाता है। इसे दुनियाभर में कोरोना का सबसे अधिक संक्रामक वैरियंट माना जाता है।

अल्फा वैरियंट

  • पिछले साल के अंत में दुनियाभर में कोरोना के अल्फा वैरियंट ने तहलका मचाया हुआ था। इसको वैज्ञानिक भाषा में B.1.1.7 का नाम दिया गया है। इसे सबसे पहले इंग्लैंड में खोजा गया था। यहीं से यह वैरियंट पूरी दुनिया में फैला था। अमेरिका में भी इस वैरियंट ने खासी तबाही मचाई थी।

बीटा वैरियंट

  • इस वैरियंट को सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में देखा गया था। बीटा वैरियंट का वैज्ञानिक नाम B.1.351 है। इसके दो म्यूटेशन E484K और N501Y को सबसे अधिक खतरनाक माना गया है।

गामा वैरियंट

  • कोरोना वायरस का गामा वैरियंट सबसे पहले ब्राजील में पाया गया था। गामा वैरियंट का वैज्ञानिक नाम P.1 है। सीडीसी के अनुसार, यह वैरियंट अमेरिका में 8.9 फीसदी नए संक्रमणों का कारण है। गामा वैरियंट के दो स्ट्रेन E484K और N501Y काफी खतरनाक माना गया

एप्सिलॉन वैरियंट

  • कोरोना वायरस के एप्सिलॉन वैरियंट का वैज्ञानिक नाम B.1.427 है। विश्व स्वास्थ्य संगठन B.1.429 वेरिएंट को भी एप्सिलॉन वैरियंट का ही हिस्सा मानता है। इस वैरियंट को पहली बार अमेरिका के कैलिफोर्निया में देखा गया था। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एप्सिलॉन (बी.1.427 / बी.1.429) ज्यादा खतरनाक वैरियंट नहीं है।

योटा वैरियंट

  • कोरोना वायरस के इस वैरियंट को पहली बार न्यूयॉर्क में देखा गया था। इस वैरियंट को B.1.526 या Iota के नाम से जाना जाता है। सीडीसी का अनुमान है कि यह वैरियंट अमेरिका में वर्तमान में कोरोना वायरस के केवल 3 फीसदी मामलों के लिए जिम्मेदार है। अप्रैल महीने में यह वैरियंट 9 फीसदी मामलों के लिए जिम्मेदार था। इसका 484 स्ट्रेन वायरस को संक्रमित कोशिकाओं से अधिक आसानी से जुड़ने में मदद करता है।

ईटा वैरियंट

  • इस वैरियंट को पहली बार ब्रिटेन और नाइजीरिया में देखा गया था। ईटा वैरियंट को B.1.525 के नाम से भी जाना जाता है। इसके स्ट्रेन का नाम E484K है। अमेरिका में इस वैरियंट से संक्रमित होने वाले लोगों की तादाद काफी कम है। अब लगभग किसी भी संक्रमित व्यक्ति में कोरोना का यह स्ट्रेन नहीं मिल रहा है।

जीटा वैरियंट

  • जीटा वैरियंट भी पहली बार ब्राजील में पाया गया था। इसे P.2 के नाम से भी जाना जाता है। इस वैरियंट ने ब्राजील में बहुत तबाही मचाई थी। इसका E484K स्ट्रेन काफी घातक माना जाता है। हालांकि, विश्व स्तर पर यह स्ट्रेन अब नहीं मिल रहा है।

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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

इसरो का F10/EOS-03 मिशन असफल

चर्चा में क्यों?

  • इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) का अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (EOS-03) यानी ‘आई इन द स्काय’ को लॉन्च करने का मिशन फेल हो गया।

 महत्वपूर्ण बिंदु

  • श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 12 अगस्त 2021 को जीएसएलवी-एफ 10 के जरिए धरती पर निगरानी रखने वाले उपग्रह ईओएस-03 का प्रक्षेपण किया। मगर क्रायोजेनिक इंजन में आई तकनीकी खराबी की वजह से यह मिशन सफल नहीं हो पाया।
  • इस मिशन में इसरो को अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट लॉन्च करना था। मिशन सफल होता तो इसके जरिए भारत के साथ-साथ चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर भी रियलटाइम निगरानी संभव हो जाती।

क्या होता है क्रायोजैनिक इंजन?

  • किसी क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic engine – CE) का संचालन उच्च कुशलता युक्त प्रणोदक के संयोजन, द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन के परिणामस्वरूप होता है।
  • यह और बात है कि इन तत्त्वों का अत्यधिक कम तापमान (मुख्यतः द्रव हाइड्रोजन का) उस समय अत्यधिक कठिनाई उत्पन्न करता है जब इन्हें प्रक्षेपास्त्रों में उपयोग किया जाता है।
  • वस्तुतः क्रायोजेनिक चरण किसी इंजन को वैसे ही व्यवस्थित रखने का कार्य करता है जैसे कि प्रणोदकों और सभी पाइपों के लिये कुचालक टैंक, वाल्व और अन्य तत्त्वों को इंजन में होने वाले प्रवाह को नियंत्रित करने के लिये आवश्यकता होती है।
  • थ्रस्ट प्रदान करने के लिये हाइड्रोजन सबसे अच्छा ईंधन माना जाता है, किंतु हाइड्रोजन प्राकृतिक रूप में गैसीय अवस्था में पाया जाता है। इस अवस्था में इसको नियंत्रित करना मुश्किल होता है, इसलिये इसको तरल अवस्था में परिवर्तित करके उपयोग किया जाता है।
  • तरल अवस्था में हाइड्रोजन के उपयोग के लिये शून्य से 250 डिग्री सेल्सियस कम तापमान की आवश्यकता होती है। इस प्रकार की तकनीक में ऑक्सीजन का भी उपयोग तरल रूप में किया जाता है।
  • ऑक्सीजन को तरल अवस्था में उपयोग करने के लिये शून्य से 90 डिग्री सेल्सियस कम तापमान की ज़रूरत होती है। इस स्थिति में अन्य पदार्थों को इन गैसों के साथ एक इंजन में उपयोग करना बेहद जटिल प्रक्रिया है।

भारत में क्रायोजैनिक तकनीक के विकास का इतिहास

  • भारत के लिये GSLV तकनीक के विकास का इतिहास तीन दशक पुराना है। आरंभ में भारत ने 1980 के दशक में अमेरिका से यह तकनीक प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु अमेरिका के इनकार के पश्चात् भारत को स्वदेशीकरण की ओर मुड़ना पड़ा।
  • लेकिन भारतीय प्रयास आशा के अनुरूप नहीं रहे तथा भारत ने रूस से क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन अमेरिकी दबाव के कारण भारत को रूस से यह तकनीक नहीं मिल पाई। इसके पश्चात् भारत ने स्वयं क्रायोजेनिक तकनीक के निर्माण का प्रयास तिरुवनंतपुरम के LPSC (Liquid Propulsion Systems Centre) केंद्र में आरंभ किया।
  • वर्ष 2014 में भारत को इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई और इसके पश्चात् वर्ष 2017 तथा वर्ष 2018 में दो बार मार्क III प्रमोचन यान का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया। इसरो का चंद्रयान-2 मिशन इस प्रमोचन यान द्वारा भेजा जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण मिशन रहा है।

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चर्चित स्थान

गाजियाबाद

चर्चा में क्यों?

  • ब्रिटिश कंपनी हाउसफ्रेश द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार झिंजियांग प्रांत में चीनी शहर होटन को सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश का गाजियाबाद सूची में दूसरे स्थान पर है।
  • होटन में प्रदूषण के लिए रेगिस्तान को जिम्मेदार बताया गया है क्योंकि यह तकलीमाकन रेगिस्तान के नजदीक में बसा हुआ है।
  • वहीं, गाजियाबाद के मामले में रिपोर्ट में कहा गया है है कि शहर के प्रदूषित होने के लिए यहां पर यातायात की वजह से बड़े पैमाने पर प्रदूषण होता है। बांग्लादेश का मानिकगंज दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में 80.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के पीएम 2.5 के साथ तीसरे स्थान पर है।

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चर्चित दिवस

डी जुरे ट्रांसफर डे

चर्चा में क्यों?

  • एक क्षेत्रीय सार्वजनिक अवकाश है, जो पुडुचेरी में प्रतिवर्ष 16 अगस्त को मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन वर्ष 1962 में पुद्दुचेरी का भारतीय संघ में विलय हुआ था।
  • उल्लेखनीय है कि15 अगस्त, 1947 को संपूर्ण भारत को स्वतंत्रता मिल गई, किंतु उस समय देश के कई क्षेत्र ऐसे भी थे जो यूरोपीय देशों के नियंत्रण में थे। वर्तमान केंद्रशासित प्रदेश पुद्दुचेरी में तत्कालीन फ्राँसीसी उपनिवेश- पुद्दुचेरी, कराईकल, माहे और यनम इनमें शामिल थे।
  • पुद्दुचेरी और कराईकल क्षेत्र तमिलनाडु राज्य से घिरे हुए हैं, जबकि माहे केरल राज्य से और यनम आंध्र प्रदेश राज्य से घिरा हुआ है।
  • 1 नवंबर, 1954 को फ्राँसीसी कब्ज़े वाले भारत के क्षेत्रों को वास्तव में भारत गणराज्य में स्थानांतरित कर दिया गया था और 16 अगस्त, 1962 को भारत में फ्राँसीसी अस्तित्व समाप्त हो गया तथा फ्राँसीसी संसद ने भारत सरकार और फ्राँसीसी सरकार द्वारा हस्ताक्षरित संधि की पुष्टि कर दी।

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रक्षा-प्रतिरक्षा

वार्षिक द्विपक्षीय अभ्यास कोंकण

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में आईएनएस तबर भारतीय नौसेना और ब्रिटेन की रॉयल नेवी के बीच वार्षिक द्विपक्षीय अभ्यास कोंकण के लिए हाल ही में ब्रिटेन के पोर्ट्समाउथ पहुंचा।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • भारतीय नौसेना और रॉयल नेवी के बीच अद्वितीय ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। वे 2004 से हर साल द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास कोंकण आयोजित कर रहे हैं।
  • भारतीय नौसेना के पश्चिमी बेड़े का हिस्सा युद्धपोत, जून की शुरुआत में मुंबई से रवाना हुआ और ब्रिटेन जाने के दौरान रूस और इटली में अभ्यास में शामिल हुआ। इसके अगले महीने तक भारत वापस आने की उम्मीद है।
  • अभ्यास कोंकण के इस वर्ष के संस्करण की शुरुआत तब हुई जब भारतीय नौसेना और रॉयल नेवी अभ्यास के बंदरगाह चरण से पहले समुद्र में अभ्यास के लिए मिलीं।

प्रमुख युद्धभ्यास   

सिम्बेक्स-    इंडियन नेवी व सिंगापुर नेवी

सम्प्रीति-     भारत एवं बाग्लादेश

सूर्य किरण-   भारत और नेपाल

हैंड इन हैंड – भारत और चीन

मित्र शक्ति- भारत और श्री लंका, थल सेना

सहयोग कजिन- भारत और जापान

धर्म गार्जियन- भारत और जापान   थल सेना

शिन्यू मैगी   -भारत एवं जापान वायु सेना

मालाबार-     भारत, जापान और अमेरिका

पैसेज – भारत और इंडोनेशिया

सिटमैक्स – भारत, सिंगापुर और थाईलैंड

बज्रप्रहार- भारत और जापान 11 वां संस्करण

डेजर्ट फ्लेग- भारत, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, बहरीन और यूएई यूएई के रेगिस्तान में

डेजर्ट नाइट- भारत और फ्रांस

ट्रोपेक्स- भारत की नौ सेना

दस्तलिक- 2 भारत और उज्बेकिस्तान

खंजर- भारत और किर्गिस्तान

वरूण -भारत एवं फ्रांस

गरूड़ -भारत और फ्रांस वायु सेना

हैंड इन हैंड -भारत और चीन

अजय वारियर-भारत और यूके

नसीम अल बाहर- भारत और ओमान

नोमैडिक एलीफैंट-भारत और मंगोलिया

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चर्चित व्यक्तित्व

महात्मा गांधी

चर्चा में क्यो?

  • अमेरिका की एक प्रभावशाली सांसद ने महात्मा गांधी को मरणोपरांत प्रतिष्ठित कांग्रेशनल गोल्ड मेडल से सम्मानित करने संबंधी एक प्रस्ताव अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पेश किया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • कांग्रेशनल गोल्ड मेडल अमेरिका में सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। न्यूयॉर्क से कांग्रेस सदस्य कैरोलिन बी मेलोनी ने प्रतिनिधिसभा में इस संबंध में प्रस्ताव पेश करते हुए कहा, ‘‘विरोध प्रदर्शित करने के महात्मा गांधी के अहिंसक एवं ऐतिहासिक सत्याग्रह अभियान ने राष्ट्र और विश्व को प्रेरित किया।
  • उनका उदाहरण हमें प्रोत्साहित करता है कि हम स्वयं को दूसरों की सेवा में समर्पित करें।’’
  • यह सम्मान जॉर्ज वॉशिंगटन, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मदर टेरेसा और रोजा पार्क्स को मिल चुका है।

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योजना/परियोजना

राष्ट्रीय खाद्य तेलपाम ऑयल मिशन (एनएमईओ-ओपी)

चर्चा में क्यों

  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में ताड़ के तेल (पाम ऑयल) के लिये एक नये मिशन की शुरुआत को मंजूरी दी गई है, जिसका नाम राष्ट्रीय खाद्य तेल–पाम ऑयल मिशन (एनएमईओ-ओपी) है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • यह केंद्र द्वारा प्रायोजित एक नई योजना है और इसका फोकस पूर्वोत्तर के क्षेत्रों तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर है।
  • खाद्य तेलों की निर्भरता बड़े पैमाने पर आयात पर टिकी है, इसलिये यह जरूरी है कि देश में ही खाद्य तेलों के उत्पादन में तेजी लाई जाये। इसके लिये पाम ऑयल का रकबा और पैदावार बढ़ाना बहुत अहम है।
  • इस योजना के लिये 11,040 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय निर्धारित किया गया है, जिसमें से केंद्र सरकार 8,844 करोड़ रुपये का वहन करेगी।
  • इसमें 2,196 करोड़ रुपये राज्यों को वहन करना है। इसमें आय से अधिक खर्च होने की स्थिति में उस घाटे की भरपाई करने की भी व्यवस्था शामिल की गई है।
  • इस योजना के तहत, प्रस्ताव किया गया है कि वर्ष 2025-26 तक पाम ऑयल का रकबा 6.5 लाख हेक्टेयर बढ़ा दिया जाये और इस तरह आखिरकार 10 लाख हेक्टेयर रकबे का लक्ष्य पूरा कर लिया जाये।
  • इस योजना से पाम ऑयल के किसानों को बहुत लाभ होगा, पूंजी निवेश में बढ़ोतरी होगी, रोजगार पैदा होंगे, आयात पर निर्भरता कम होगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी।
  • योजना का दूसरा प्रमुख पहलू यह है कि विभिन्न तरह की भूमिकाओं और गतिविधियों में तेजी लाई जाये। ताड़ की खेती के लिये सहायता में भारी बढ़ोतरी की गई है।
  • पहले प्रति हेक्टेयर 12 हजार रुपये दिये जाते थे, जिसे बढ़ाकर 29 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है। इसके अलावा रख-रखाव और फसलों के दौरान भी सहायता में बढ़ोतरी की गई है। पुराने बागों को दोबारा चालू करने के लिये 250 रुपये प्रति पौधा के हिसाब से विशेष सहायता दी जा रही है, यानी एक पौधा रोपने पर 250 रुपये मिलेंगे।
  • देश में पौधारोपण साजो-सामान की कमी को दूर करने के लिये, बीजों की पैदावार करने वाले बागों को सहायता दी जायेगी। इसके तहत भारत के अन्य स्थानों में 15 हेक्टेयर के लिये 80 लाख रुपये तक की सहायता राशि दी जायेगी, जबकि पूर्वोत्तर तथा अंडमान क्षेत्रों में यह सहायता राशि 15 हेक्टेयर पर एक करोड़ रुपये निर्धारित की गई है।
  • इसके अलावा शेष भारत में बीजों के बाग के लिये 40 लाख रुपये और पूर्वोत्तर तथा अंडमान क्षेत्रों के लिये 50 लाख रुपये तय किये गये हैं।
  • पूर्वोत्तर और अंडमान को विशेष सहायता का भी प्रावधान है, जिसके तहत पहाड़ों पर सीढ़ीदार अर्धचंद्राकार में खेती, बायो-फेंसिंग और जमीन को खेती योग्य बनाने के साथ एकीकृत किसानी के लिये बंदोबस्त किये गये हैं।

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पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी

किगाली संशोधन के अनुसमर्थन को स्वीकृति

चर्चा में क्यों?

  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (Hydrofluorocarbon) के उपयोग को चरणबद्ध तरीके समाप्त करने के लिए ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों से संबंधित मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में किए गए किगाली संशोधन के अनुसमर्थन को स्वीकृति दे दी है।
  • इस संशोधन को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के लिए अक्टूबर, 2016 में रवांडा के किगाली में आयोजित मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के पक्षकारों की 28वीं बैठक के दौरान अंगीकृत किया गया था।

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन क्या है?

  • यह ग्रीनहाउस परिवार की ऐसी गैस है, जो घरों एवं कारों में ठंडक देने वाले उपकरणों में प्रयोग की जाती है। सामान्य तौर पर इसे R-22 के नाम से भी जाना जाता है।
  • 1 किग्रा. कार्बन डाइ ऑक्साइड की तुलना में यह गैस 14,800 गुना अधिक गर्मी बढ़ाती है।
  • विश्व में बढ़ती ग्रीन हाउस गैसों में इसका अनुपात सबसे ज्यादा है। इसका उत्सर्जन प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत बढ़ रहा है।
  • हाइड्रोफ्लोरो कार्बन, ग्रीनहाऊस प्रभाव पैदा कर वायुमंडल का ताप बढ़ाने के मामले में कार्बन डाइऑक्साइड से हज़ार गुना खतरनाक है। इसलिये जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने हेतु भारत सहित 200 देशों ने हाइड्रोफ्लोरो  कार्बन (एचएफसी) का इस्तेमाल कम करने के लिये कानूनी रूप से बाध्य ऐतिहासिक ‘किगाली समझौता’ किया।
  • समझौते के तहत विकसित देश जैसे- यूरोपीय संघ, अमेरिका तथा जापान आदि वर्ष 2019 से ही एचएफसी में कटौती प्रारंभ करेंगे तथा वर्ष 2036 तक इसके उपयोग में वर्ष 2010-12 के आधार स्तर से 85% तक कमी लाएंगे।
  • चीन, ब्राज़ील तथा अन्य देश वर्ष 2045 तक वर्ष 2020-22 के उत्सर्जित स्तर से एचएफसी के प्रयोग को 85% तक कम करेंगे।
  • भारत, ईरान, पाकिस्तान तथा खाड़ी देश आदि वर्ष 2028 से एचएफसी के उत्सर्जन में कटौती करना प्रारंभ करेंगे तथा वर्ष 2047 तक वर्ष 2024-26 के स्तर से 85% तक इस्तेमाल में कमी लाएंगे।
  • यह समझौता वैश्विक तापन को 0.50C तक कम रखने में सहायक होगा। इस समझौते की आवश्यकता एवं विशिष्टता के मद्देनज़र भारत ने भी सक्रियता से इसमें भाग लेते हुए वर्ष 2030 तक एचएफसी-23 के उपयोग को पूर्णतः समाप्त करने की प्रतिबद्धता जताई है तथा एचएफसी के अन्य विकल्पों का प्रयोग करने हेतु सहमति प्रदान की।

क्या लाभ होंगें इस समझौते के?

  • एचएफसी के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से बंद करने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन को रोकने में मदद मिलेगी और इससे लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
  • गैर-एचएफसी और कम ग्लोबल वार्मिंग संभावित प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण के अंतर्गत तय समय-सीमा के अनुसार हाइड्रोफ्लोरोकार्बन का उत्पादन और खपत करने वाले उद्योग हाइड्रोफ्लोरोकार्बन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करेंगे।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल

  • यह ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि है, जिसमें मानव निर्मित रसायनों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाता है, इन्हें ओजोन क्षयकारी पदार्थ (ओडीएस) कहा जाता है।
  • स्ट्रेटोस्फेरिक की ओजोन परत मानव और पर्यावरण को सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों के हानिकारक स्तरों से बचाती है।
  • भारत 19 जून 1992 को ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का एक पक्षकार बन गया था और तभी से भारत ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधनों की पुष्टि की है। कैबिनेट की वर्तमान मंजूरी, भारत में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन को चरणबद्ध तरीक से कम करने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में किगाली संशोधन की पुष्टि करेगा।
  • भारत ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अनुसूची के अनुसार सभी ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लक्ष्यों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

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