आर्कटिक के ऊपर ओजोन परत में क्षरण

लॉकडाउन के बाद पर्यावरण में सुधार तो आ रहा है, लेकिन आर्कटिक के ऊपर ओजोन की मात्रा में कमी ने वैज्ञानिकों को चिंता में डाल दिया है। आर्यभटट् प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज, नैनीताल) के वैज्ञानिकों के अनुसार, शीत ऋतु में इस बार अत्यधिक ठंड पड़ने व क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों के उत्सर्जन के कारण ओजोन लेयर में विशाल होल बना है। इस होल का दायरा 10 लाख किलोमीटर है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ओजोन में यह होल मध्य मार्च में बना है।
इसके पीछे मुख्यत: दो कारण हैं। पहला, इस बार अधिक ठंड पड़ी, जिससे यहां का तापमान माइनस 80 डिग्री सेल्सियस से नीचे पहुंच गया था, जिससे ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली खतरनाक क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC)गैसें उच्च आसमान के बादलों में फंसकर रह गईं। बादलों का यह क्षेत्र आसमान में करीब 20 किलोमीटर की उंचाई पर होता है, जहां गैस कैद होकर रह जाती हैं। मगर जब तापमान बढ़ता है तो बादलों का बिखराव शुरू हो जाता है, जिससे गैसें बाहर निकलने लगती हैं। इन गैसों के उत्सर्जन से ओजोन लेयर में छेद होने लगता है।
क्या है क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)?
क्लोरोफ्लोरोकार्बन-11 (Chlorofluorocarbon-11)CFC-11, जिसे ट्राइक्लोरोफ्लोरोमीथेन के रूप में भी जाना जाता है, कई क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) रसायनों में से एक है, जिन्हें 1930 के दशक के दौरान शुरू में शीतलक के रूप में विकसित किया गया था। CFCs समतापमंडलीय ओज़ोन क्षरण हेतु ज़िम्मेदार प्रमुख पदार्थ है।
वियना सम्मेलन (Vienna Convention)
ओज़ोन क्षरण के मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते हेतु अंतर-सरकारी वार्ता वर्ष 1981 में प्रारंभ हुई। मार्च, 1985 में ओज़ोन परत के संरक्षण के लिये वियना में एक विश्वस्तरीय सम्मेलन हुआ, जिसमें ओज़ोन संरक्षण से संबंधित अनुसंधान पर अंतर-सरकारी सहयोग, ओज़ोन परत का सुव्यवस्थित तरीके से निरीक्षण, क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैसों की निगरानी और सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा की गई।
इस सम्मेलन में मानव स्वास्थ्य और ओज़ोन परत में परिवर्तन करने वाली मानवीय गतिविधियों की रोकथाम करने के लिये प्रभावी उपाय अपनाने पर सदस्य देशों ने प्रतिबद्धता व्यक्त की।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol)
ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले विभिन्न पदार्थों के उत्पादन तथा उपभोग पर नियंत्रण के उद्देश्य के साथ विश्व के कई देशों ने 16 सितंबर, 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये थे। जिसे आज विश्व का सबसे सफल प्रोटोकॉल माना जाता है।यह पहली अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसने ग्लोबल वार्मिंग की दर को सफलतापूर्वक धीमा किया है।गौरतलब है कि इस प्रोटोकॉल पर विश्व के 197 पक्षकारों ने हस्ताक्षर किये हैं।

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