मानसून, चक्रवातों एवं मौसम पूर्वानुमानों के लिए BoBBLE कार्यक्रम

भारतीय विज्ञान संस्थान (IIS) एवं ब्रिटेन की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया’ (University of East Anglia) की एक टीम ने मानसून, उष्णकटिबंधीय चक्रवातों एवं मौसम संबंधी अन्य पूर्वानुमानों की सटीक भविष्यवाणी के लिये एक ‘बे ऑफ बंगाल बाउंड्री लेयर एक्सपेरिमेंट’ (Bay of Bengal Boundary Layer Experiment- BoBBLE) कार्यक्रम शुरु किया है। इस परियोजना का उद्देश्य मानसून प्रणाली पर बंगाल की खाड़ी में समुद्री प्रक्रियाओं के प्रभाव की जाँच करना है।
इस परियोजना को भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय एवं ब्रिटेन के ‘प्राकृतिक पर्यावरण अनुसंधान परिषद’ (NERC) द्वारा वित्तपोषित किया गया है।
इस परियोजना के तहत बंगाल की खाड़ी में होने वाले बदलावों का अवलोकन करने के लिये दो जहाज़, छह महासागरीय ग्लाइडर्स एवं आठ नावों को तैनात किया जाएगा।
ये दोनों जहाज़ बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व में स्थापित किये जायेंगे जिससे इस क्षेत्र में हवाओं एवं समुद्री धाराओं के पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण मार्गों का पता लगाते हुए, समुद्री तापमान, लवणता एवं धाराओं का अवलोकन करेंगे।
मानसून
भारत में मानसून उन ग्रीष्मकालीन हवाओं को कहते हैं जिनसे वर्षा होती हैं, ये हवाएं बंगाल की खाड़ी, अरब सागर एवं हिंद महासागर से होकर आती है। इनकी दिशा दक्षिण पश्चिम एवं दक्षिण से उत्तर एवं उत्तर पश्चिम की ओर होती है।
इस कारण इन्हें दक्षिण पश्चिम मानसून हवाओं के नाम से भी जाना जाता है।
ग्रीष्मकाल में मानसून हवाएं सागर से स्थल की ओर एवं शीतकाल में स्थल से सागर की ओर चला करती है। दिशा बदलने के कारण प्रथम को दक्षिण पश्चिम मानसून एवं द्वितीय को उत्तर पूर्वी मानसून या लौटता मानसून कहते हैं।
ये मानसून हवाएं इतनी प्रबल होती हैं कि इनके प्रभाव से उत्तरी हिंद महासागर में महासागरीय धारा प्रवाहित होने लगती है तथा इन हवाओं की दिशा के साथ ये महासागरीय धारा भी इन हवाओं की दिशा में अपनी दिशा बदल लेती हैं।
इस प्रकार सागरीय धाराओं का वर्ष में दो बार दिशा बदलना केवल हिंद महासागर में होता है। मानसून हवाओं के नाम पर उत्तरी हिंद महासागर की इस धारा को मानसून धारा कहते हैं।
मानसून हिन्द महासागर में उत्‍पन्न होता है और मई के दूसरे सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीपों में दस्तक देता है। इसके पश्चात् जून के पहले सप्ताह में केरल में इसका आगमन होता है।
देश में मानसून के चार महीनों में 89 सेंटीमीटर औसत बारिश होती है। 80 फीसदी बारिश मानसून के चार महीनों जून-सितंबर के दौरान होती है।
देश की 65 फीसदी खेती-बाड़ी मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। बिजली उत्पादन, भूजल का पुनर्भरण, नदियों का पानी भी मानसून पर निर्भर करता है।
पश्चिम तट और पूर्वोत्तर के राज्यों में 200 से एक हजार सेमी बारिश होती है जबकि राजस्थान और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मानसूनी बारिश सिर्फ 10-15 सेमी ही होती है।

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