कोरोना महामारी से संकट में बनारसी जरदोजी के कारीगर

चर्चा में क्यों?

  • बनारसी जरदोजी की मांग न केवल देश बल्कि विदेशों में भी खूब है, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इस हस्तशिल्प आजीविका कमाने वाले कारीगर अब बेरोजगार हो गए हैं।

जरदोजी हस्तशिल्प से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

  • इम्ब्रायडरी यानी धागों से कढ़ाई के काम को जरदोजी कहा जाता है।
  • ज़रदोज़ी का नाम फ़ारसी से आया है, जिसका अर्थ है: सोने की कढ़ाई।
  • ‘कलाबातुन’ के नाम से जानी जाती इसकी मूल प्रक्रिया के अंतर्गत असली सोने या चांदी में लिपटे रेशम के धागों का उपयोग किया जाता था; और फिर इस धागे को मोतियों आदि के साथ कपड़ों पर सिल दिया जाता था।
  • मुगल युग के दौरान ज़रदोज़ी का उपयोग तम्बुओं तथा शाही परिवारों के हाथियों और घोड़ों के लिए सजावटी सामान तैयार करने में किया जाता था।
  • यह मुगल बादशाह अकबर के समय में और समृद्ध हुई, किंतु बाद में राजसी संरक्षण के अभाव और औद्योगिकरण के दौर में इसका पतन होने लगा।
  • वर्तमान में यह फिर उभरी है। अब यह भारत के लखनऊ, भोपाल और चेन्नई आदि कई शहरों में हो रही है।
  • यूरोप के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सेना की वर्दी पर मोनोग्राम और बैजेज के पीछे बनारस की जरीदोज कारीगरी है।
  • लखनऊ की जरदोजी कला को जीआई (भौगोलिक संकेतक) दिया गया है। लखनऊ को जरदोजी के अलावा चिकनकारी के लिए भी जीआई टैग मिला है।

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