केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद पर ऐतिहास‌िक फैसले के 47 वर्ष

24 अप्रैल, 2020 को केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद पर ऐतिहास‌िक फैसले के 47 वर्ष पूरे हो गए। 24 अप्रैल, 1973 को इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की ‘आधारभूत संरचना’ (Basic Structure) का ऐतिहासिक सिद्धांत दिया था। 13 न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 7-6 के बहुमत से निर्णय किया कि संविधान की कुछ मूलभूत विशेषताओं को छोड़कर संसद किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है।इस सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान की ‘आधारभूत संरचना’ नहीं बदल सकती ।
संविधान का मूलभूत ढांचा
भारतीय न्यायिक इतिहास में ‘संविधान के मूलभूत ढांचे’ या बेसिक स्ट्रक्चर के सिद्धांत का जिक्र सबसे पहले 1965 में किया गया था। सज्जन सिंह मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मढोलकर ने तब इस सिद्धांत पर सबसे पहले विस्तृत चर्चा की थी। केशवानंद भारती मामले में जस्टिस एचआर खन्ना ने इस सिद्धांत पर और भी विस्तार से चर्चा की और तब ही यह सिद्धांत एक तरह से भारतीय संविधान का संरक्षक बन गया।
केशवानंद भारती मामले में आए इस फैसले से स्थापित हो गया कि देश में संविधान से ऊपर कोई भी नहीं है, संसद भी नहीं। यह भी माना जाता है कि अगर इस मामले में सात जज यह फैसला नहीं देते और संसद को संविधान से किसी भी हद तक संशोधन के अधिकार मिल गए होते तो शायद देश में गणतांत्रिक व्यवस्था भी सुरक्षित नहीं रह पाती।
‘आधारभूत संरचना’में क्या शामिल है?
यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘आधारभूत संरचना’ को परिभाषित नहीं किया परंतु संविधान की कुछ विशेताओं को ‘आधारभूत संरचना’ के रूप निर्धारित किया है, यथा- संघवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र आदि। तब से अदालत ने इस सूची का निरंतर विस्तार किया है।
निम्नलिखित को सर्वोच्च न्यायालय ने आधारभूत संरचना के रूप में सूचीबद्ध किया गया है:
संविधान की सर्वोच्चता
कानून का शासन
न्यायपालिका की स्वतंत्रता
शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत
संघवाद
धर्मनिरपेक्षता
संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य
संसदीय प्रणाली
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
कल्याणकारी राज्य

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