2 अप्रैल: ऑटिज्म जागरुकता दिवस

ऑटिज्म (Autism) एक ऐसी समस्या है, जिससे ग्रस्त लोगों में व्यवहार से लेकर कई तरह की दिक्कतें होती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे लोगों की स्थिति में सामाजिक स्वीकार्यता से सुधार लाया जा सकता है। ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण 1-3 साल के बच्चों में नजर आ जाते हैं। इसके प्रति जागरुकता प्रसारित करने के लिए 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस आयोजित किया जाता है।
क्या होता है ऑटिज्म?
ऑटिज्म जिसे स्वलीनता भी कहते हैं एक ऐसी मानसिक बीमारी है, जिसके शिकार बच्चे अपने आप में खोए से रहते हैं। वह सामाजिक रूप से अलग थलग रहते हैं, किसी से घुलते मिलते नहीं हैं और दूसरों से बात करने से भी हिचकते हैं। इस बीमारी के लक्षण बचपन से ही नजर आने लगते हैं। हालांकि कई वैज्ञानिक इसे बीमारी नहीं कहते। इसमें पीड़ित बच्चों का विकास धीरे होता है। यह रोग बच्चे के मानसिक विकास को रोक देता है। सामान्य तौर पर ऐसे बच्चों को उदासीन माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में ये लोग अद्भुत प्रतिभा वाले होते हैं। माना जाता है कि सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचने से यह दिक्कत होती है। कई बार गर्भावस्था के दौरान खानपान सही न होने से भी बच्चे को ऑटिज्म का खतरा हो सकता है।

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