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ओडिशा के राज्य गान के रुप में अपनाया गया 'वंदे उत्कल जननी..'

कांतकवि लक्ष्मीकांत महापात्र द्वारा रचित ‘वंदे उत्कल जननी..’ को ओडिशा सरकार ने राज्य गान के रुप में मान्यता दे दी है। राज्य सरकार के इस निर्णय के बाद अब नए शिक्षा सत्र से इसे पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि वंदे उत्कल जननी गीत ओडिशा विधानसभा एवं सभी सरकारी कार्यक्रम में गाया जा रहा था लेकिन इसे सरकार की मान्यता नहीं थी। अनेक  बार इस गीत को सरकारी मान्यता देने की मांग भी उठी थी। राज्यवासियों की भावना को सम्मान देते हुए सरकार ने मार्च 2016 में इसके लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट जून 2018 में सरकार को दे दी थी।
गीत का इतिहास
सन् 1910 में कांतकवि लक्ष्मीकांत महापात्र के द्वारा रचित वंदे उत्कल जननी गीत को पहली बार सन् 1912 में बालेश्वर में आयोजित उत्कल सम्मेलन में गाया गया था। 1 अप्रैल 1936 को ओडिशा को स्वतंत्र राज्य की मान्यता मिली और इस समय भी इस गीत को गाया गया था।
वर्ष 1994 में इस गीत को राज्य गीत के रूप में उपयोग करने के लिए तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष युधिष्ठिर दास ने सर्वदलीय कमेटी का गठन किया। 22 दिसम्बर 1994 से इस गीत को विधानसभा के प्रत्येक अधिवेशन के आरंभ एवं अंत में गाने का निर्णय लिया गया।
सन् 2000 में विधानसभा अध्यक्ष शरत कर एवं 2006 में महेश्वर महांती के समय में भी इस गीत को सरकारी मान्यता देने की मांग विधानसभा में उठी थी।

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