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जम्मू एवं कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला रिहा

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को 7 माह बाद 24 मार्च, 2020 को नजरबंदी से रिहा कर दिया गया। 5 अगस्त 2019 को जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सरकार ने उन्हें जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (Jammu and Kashmir Public Safety Act-1978,J&K PSA) के तहत नजरबंद किया गया था। इससे पहले 13 मार्च को उनके पिता एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला को भी रिहा किया गया था। वे भी सितंबर 2019 से इस एक्ट के तहत नजरबंद थे।
क्या है सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम ?
जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 एक निवारक निरोध (Preventive Detention) कानून है, इसके तहत किसी व्यक्ति को ऐसे किसी कार्य को करने से रोकने के लिये हिरासत में लिया जाता है जिससे राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
इस अधिनियम के तहत व्यक्ति को 2 वर्षों के लिये हिरासत में लिया जा सकता है। यह एक्ट राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के समान ही है, जिसका प्रयोग अन्य राज्य सरकारों द्वारा नज़रबंदी के लिये किया जाता है। इस अधिनियम की प्रकृति दंडात्मक निरोध (Punitive Detention) की नहीं है। यह अधिनियम मात्र संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) या ज़िला मजिस्ट्रेट (District Magistrate) द्वारा पारित प्रशासनिक आदेश से लागू होता है।
PSA का इतिहास:
जम्मू-कश्मीर में इस अधिनियम की शुरुआत 1978 में तत्कालीन शेख अब्दुल्ला सरकार ने लकड़ी तस्करी को रोकने के लिये की गई थी। 1990 के दशक में जब राज्य में आतंकवादी गतिविधियां तेज होने लगीं तो दंगाइयों को हिरासत में लेने के लिये राज्य सरकार ने सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम का प्रयोग काफी व्यापक स्तर पर किया।
साल 2011 से पहले तक इस अधिनियम के तहत 16 वर्ष से अधिक उम्र के किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने का प्रावधान था, लेकिन साल 2011 में अधिनियम को संशोधित कर उम्र सीमा बढ़ा दी गई और अब यह 18 वर्ष है।
अधिनियम से संबंधित प्रमुख प्रावधान:
अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, PSA का प्रयोग कर राज्य के किसी भी व्यक्ति को बिना किसी आरोप या जाँच के नज़रबंद किया जा सकता है या उसे हिरासत में लिया जा सकता है। यह नज़रबंदी 2 साल तक की हो सकती है।
PSA उस व्यक्ति पर भी लगाया जा सकता है जो पहले से पुलिस की हिरासत में है या जिसे अदालत से ज़मानत मिल चुकी है। यहाँ तक कि इस अधिनियम का प्रयोग उस व्यक्ति पर भी किया जा सकता है जिसे अदालत ने बरी किया है।
महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सामान्य पुलिस हिरासत के विपरीत, PSA के तहत हिरासत में लिये गए व्यक्ति को हिरासत के 24 घंटों के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की आवश्यकता नहीं होती है।
साथ ही हिरासत में लिये गए व्यक्ति के पास अदालत के समक्ष ज़मानत के लिये आवेदन करने का भी अधिकार होता नहीं होता एवं वह इस संबंध में किसी वकील की सहायता भी नहीं ले सकता है।
इस प्रशासनिक नज़रबंदी के आदेश को केवल हिरासत में लिये गए व्यक्ति के रिश्तेदारों द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के पास इस तरह की याचिकाओं पर सुनवाई करने और PSA को समाप्त करने के लिये अंतिम आदेश पारित करने का अधिकार है, हालाँकि यदि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका को खारिज कर देते हैं तो उस व्यक्ति के पास इस संबंध में कोई अन्य रास्ता नहीं बचता है।
इस अधिनियम में संभागीय आयुक्त अथवा ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा इस प्रकार के आदेश को पारित करना ‘सद्भाव में किया गया’ (Done in Good Faith) कार्य माना गया है, अतः आदेश जारी करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध किसी भी प्रकार की जाँच नहीं की जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि बीते वर्ष जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने इस अधिनियम में संशोधन किया था, जिसके अनुसार इस अधिनियम के तहत हिरासत में लिये गए व्यक्ति को अब राज्य के बाहर भी रखा जा सकता है।

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