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मानसून-2020 अल नीनो (El-Nino) के प्रभाव से मुक्त रहेगा

मानसून-2020 अल नीनो (El-Nino) के प्रभाव से मुक्त रहेगा। भारतीय मौसम विभाग ने 15 अप्रैल को यह पूर्वानुमान जारी किया। मानसून सीजन के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसूनी बादल जून से लेकर सितंबर तक सक्रिय रहेंगे। पूर्वानुमान के अनुसार केरल के तट पर हर साल की भांति इस बार भी मानसून एक जून को दस्तक देगा और 15 अक्टूबर को लौट जाएगा। मानसून-2020 के पर अल नीनो का प्रभाव नहीं पड़ेगा। यानी मानसून की सामान्य चाल पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। खरीफ सीजन की खेती के लिए यह पूर्वानुमान बहुत मायने रखता है। इस सीजन की प्रमुख फसल धान, मोटे अनाज, तिलहन व दलहन हैं।
कहां कब आएगा मानसून?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने के अनुसार महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में सामान्य तारीख से तीन से सात दिन की देरी से पहुंच सकता है। इसी तरह चेन्नई में मानसून एक के बदले चार जून को पहुंचेगा। वहीं, कोलकाता में 10 के बजाय 11 जून को दस्तक देगा। दिल्ली में मानसून चार दिन की देरी से 27 जून को पहुंचेगा, जबकि, पूर्वोत्तर में इंफाल में यह एक के बदले पांच जून को दस्तक देगा।
मौसम वैज्ञानिकों का यह पहला दीर्घकालिक पूर्वानुमान है जो हर साल अप्रैल के दूसरे या तीसरे सप्ताह में जारी होता है। दूसरा अनुमान मई के आखिरी सप्ताह अथवा जून के पहले सप्ताह में जारी किया जाता है। यह ज्यादा सटीक और क्षेत्रवार होने वाली बारिश का विस्तृत आकलन करता है।
मानसून सीजन के आखिरी चरण में मानसूनी बादलों पर जुलाई और अगस्त में ला नीना का असर जरूर पड़ेगा। यानी बरसात बहुत अच्छी होगी। जून से सितंबर के दौरान के 100 फीसद बारिश का अनुमान है। मौसम विभाग के मुताबिक सामान्य बारिश में 96 प्रतिशत से 104 प्रतिशत के बीच बारिश होती है। अनुमान के मॉडल में 5 फीसद कम या ज्यादा की त्रुटि हो सकती है।
अल-नीनो (El-Nino)
प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में पेरू के निकट समुद्री तट के गर्म होने की घटना को अल-नीनो कहा जाता है। दक्षिण अमेरिका के पश्चिम तटीय देश पेरू एवं इक्वाडोर के समुद्री मछुआरों द्वारा प्रतिवर्ष क्रिसमस के आस-पास प्रशांत महासागरीय धारा के तापमान में होने वाली वृद्धि को अल-नीनो कहा जाता था।य ह दक्षिण-पश्चिम मानसून को प्रभावित करता है।
अल-नीनो का प्रभाव
अल-नीनो के प्रभाव से प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म हो जाती है, इससे हवाओं के रास्ते और रफ्तार में परिवर्तन आ जाता है जिसके चलते मौसम चक्र बुरी तरह से प्रभावित होता है।
मौसम में बदलाव के कारण कई स्थानों पर सूखा पड़ता है तो कई जगहों पर बाढ़ आती है। इसका असर दुनिया भर में महसूस किया जाता है।
जिस वर्ष अल-नीनो की सक्रियता बढ़ती है, उस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून पर उसका असर निश्चित रूप से पड़ता है। इससे पृथ्वी के कुछ हिस्सों में भारी वर्षा होती है तो कुछ हिस्सों में सूखे की गंभीर स्थिति भी सामने आती है।
भारत भर में अल-नीनो के कारण सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है, जबकि ला-नीना के कारण अत्यधिक बारिश होती है।
ला-नीना (La-Nina) भी मानसून का रुख तय करने वाली सामुद्रिक घटना है। यह घटना सामान्यतः अल-नीनो के बाद होती और उसके विपरीत होती है। उल्लेखनीय है कि अल-नीनो में समुद्र की सतह का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है, जबकि ला-नीना में समुद्री सतह का तापमान बहुत कम हो जाता है।
पश्चिमी प्रशांत महासागर में अल-नीनो द्वारा उत्पन्न सूखे की स्थिति को ला-नीना बदल देती है, तथा यह आर्द्र जलवायु को जन्म देती है।
ला-नीना की शुरुआत के साथ पश्चिमी प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय भाग में तापमान में वृद्धि होने के कारण वाष्पीकरण अधिक होने से इंडोनेशिया तथा समीपवर्ती भागों में सामान्य से अधिक वर्षा होती है। ला-नीना परिघटना कई बार विश्व में बाढ़ का सामान्य कारण बन जाती है।
 
 

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