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उत्तर प्रदेश में तीन साल तक नहीं लागू होंगे प्रमुख श्रम कानून

उत्तर प्रदेश सरकार ने कोरोनोवायरस (COVID-19) महामारी के कारण राज्य की औद्योगिक गतिविधियों को पुनः पटरी पर लाने के एक उपाय के रूप में आगामी तीन वर्षों के लिये सभी व्यवसायों और उद्योगों को प्रमुख श्रम कानूनों से छूट देने वाले अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी है।इस अध्यादेश को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के पास उनकी मंज़ूरी के लिये भेजा गया है।
क्यों लाया गया ये अध्यादेश?
COVID-19 के प्रकोप के फलस्वरूप राज्य में आर्थिक गतिविधियाँ काफी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं और आगामी समय में इसका और अधिक प्रभाव दिख सकता है।इसका प्रमुख कारण यह है कि महामारी को देखते हुए लागू किये गए देशव्यापी लॉकडाउन के कारण राज्य के सभी उद्योग और व्यवसाय रुक गए हैं। इसलिए निवेशकों को आकर्षित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
राज्य सरकार द्वारा इस संदर्भ में जारी अधिसूचना के अनुसार, सरकार द्वारा लागू किये गए अध्यादेश के माध्यम से सभी प्रतिष्ठानों, कारखानों और व्यवसायों पर लागू होने वाले श्रम कानूनों से उन्हें छूट प्रदान की गई है।
फिर भी बने रहेंगे ये प्रावधान
हालाँकि इस अवधि में भी राज्य में भवन तथा अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम, 1996; कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम 1923; बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976; और मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936 की धारा 5 लागू होंगे।
मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936 की धारा 5 में समय पर मज़दूरी प्राप्त करने के अधिकार का उल्लेख किया गया है।
इसके अतिरिक्त श्रम कानूनों में बच्चों और महिलाओं से संबंधित प्रावधान अभी जारी रहेंगे।
राज्य सरकार के अध्यादेश के अनुसार, तीन वर्षीय अवधि में अन्य सभी श्रम कानून निष्प्रभावी हो जाएंगे, जिसमें औद्योगिक विवादों को निपटाने, व्यावसायिक सुरक्षा, श्रमिकों के स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति, ट्रेड यूनियन, अनुबंध श्रमिकों और प्रवासी मज़दूरों से संबंधित कानून शामिल हैं।
यह अध्यादेश राज्य में मौजूदा व्यवसायों तथा उद्योगों और राज्य में स्थापित होने वाले नए कारखानों दोनों पर लागू होगा।

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