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सस्ते कच्चे तेल से रणनीतिक भंडार भरेगा भारत

कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में आई गिरावट का फायदा उठाते हुए भारत ने अपने रणनीतिक भूमिगत भंडारों को भरने की तैयारी शुरू की है। इसके लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इराक से कच्चे तेल की खरीद की जाएगी।भारत ने कर्नाटक के मंगलुरू और पादुर तथा आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में 53.33 लाख टन का आपातकालीन भूमिगत भंडार तैयार किया है। यह भारत की 10 दिन की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। अभी मंगलुरू और पादुर के भंडार आधे खाली हैं जबकि विशाखापत्तनम वाले भंडार में भी कुछ जगह रिक्त है।
अबुधाबी नेशनल ऑयल कंपनी ने मंगलुरू की 15 लाख टन भंडारण क्षमता में आधी हिस्सेदारी खरीदी थी। इसके अलावा भारत ने पादुर और उड़ीसा के चांदीखोल में 65 लाख टन क्षमता का दूसरा रणनीतिक तेल भंडार बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके तैयार हो जाने पर भारत के पास अतिरिक्त 11.5 दिन के खपत के बराबर तेल भंडार हो जाएगा।भारतीय तेल कंपनियां रिफाइनरी के लिए अपना अलग भंडार रखती हैं। इनकी कुल भंडार क्षमता देश के 65 दिन के तेल खपत के लिए पर्याप्त है। हालांकि, इनकी गिनती रणनीतिक तेल भंडार के रूप में नहीं होती है। यह वजह है कि भारत रणनीतिक भंडार बना रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के मानकों के मुताबिक उसके सदस्य देशों के पास तीन माह की खपत के बराबर भंडार होना चाहिए। उसका कहना है कि भारत का मौजूदा रणनीतिक भंडार केवल 10 दिन के बराबर का है जो पर्याप्त नहीं है।
भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार कच्चे तेल से संबंधित किसी भी संकट जैसे प्राकृतिक आपदाओं, युद्ध या अन्य आपदाओं के दौरान आपूर्ति में व्यवधान से निपटने के लिये कच्चे तेल के विशाल भंडार होते हैं। भारत के रणनीतिक कच्चे तेल के भंडार वर्तमान में विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), मंगलुरु और पाडुर (कर्नाटक) में स्थित हैं।हाल ही में सरकार ने चंदीखोल (ओडिशा) और पाडुर (कर्नाटक) में दो अतिरिक्त सुविधाएँ स्थापित करने की घोषणा की है।
इन भंडारों में खनिज तेल का भंडारण भूमिगत चट्टान केवर्नों में किया जाता है।खनिज तेल भंडारण सुविधाओं के निर्माण का प्रबंधन इंडियन स्‍ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्वस लिमिटेड (ISPRL) द्वारा किया जा रहा है, जो तेल उद्योग विकास बोर्ड (OIDB) की पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी कंपनी है। इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) द्वारा तीनों स्थलों हेतु परियोजना प्रबंधन परामर्शदाता के रूप में कार्य किया जाता है।
रणनीतिक भंडार की अवधारणा कहां से आई?
उल्लेखनीय है कि पहली बार तेल के संकट के बाद रणनीतिक भंडार की इस अवधारणा को 1973 में अमेरिका में लाया गया था।
पृथ्वी की सतह के नीचे गहरी गुफाओं में भंडारण की अवधारणा को पारंपरिक रूप से एक ऊर्जा सुरक्षा उपाय के रूप में लाया गया है जो भविष्य में आपात स्थिति में तेल की आपूर्ति में कमी आने पर सहायक हो सकती हैं।
भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों की शुरुआत कब हुई?
वर्ष 1990 में हुए प्रथम खाड़ी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बहुत उछाल आया था जिसके कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बहुत गिरावट आई थी और भारत के पास आयातित माल का भुगतान करने के लिए केवल तीन हफ्ते के आयात (1.2 बिलियन डॉलर) का धन बचा था। तेल बाजार में उत्पन्न हुई समस्या का दीर्घकालिक समाधान निकलने के लिए अटल बि‍हारी वाजपेयी सरकार ने 1998 में ऑयल रि‍जर्व करने का विचार दिया था।
भारत में पेट्रोलियम भंडारों की आवश्यकता
वर्तमान समय में भी भारत को अपनी जरुरत का 83% पेट्रोलियम आयात करना पड़ता है। इसके अलावा अक्सर पेट्रोलियम के दामों में उतार चढ़ाव होता रहता है और भारत अपनी ज्यादातर पेट्रोलियम की खपत के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहता है। इसी कारण आपात स्थिति का सामना करने के लिए इन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है।
वर्तमान में भारत के इन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों 13 दिन की पेट्रोलियम की जरुरत को पूरा किया जा सकता है। लेकिन केवल 13 दिन का भंडार भारत के लिए ज्यादा ऊर्जा सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। भारत को 90 दिनों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त 13.32 मीट्रिक टन क्षमता भंडार बनाने की जरूरत है जो कि दूसरे चरण में बनने वाले भंडारों की मदद से हासिल कर ली जाएगी।

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