Follow Us On

भारत की पहली राज्य स्तरीय ई-लोक अदालत

चर्चा में क्यों?

  • छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में भारत की पहली राज्य स्तरीय ई-लोक अदालत (E-Lok Adalat) की शुरुआत हो गई है।
  • राज्य स्तरीय ई-लोक अदालत 11 जुलाई 2020 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में आयोजित की गई।
  • इसका उद्घाटन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.आर रामचंद्र मेनन ने किया।

ई-लोक अदालत उच्च न्यायालय के साथ सभी जिला न्यायालयों और तहसील न्यायालयों में भी आयोजित की गई।

  • यह देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ, जब लोक अदालत वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई।

क्या होती है लोक अदालत?

  • लोक अदालतें ऐसे मंच या फोरम हैं जहाँ न्यायालय में लंबित या मुकदमों का सौहार्द्रपूर्ण तरीके से निपटारा किया जाता है।
  • यह सामान्य न्यायालयों से अलग होती हैं, क्योंकि यहाँ विवादित पक्षों के बीच परस्पर समझौते के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाता है।
  • लोक अदालत की स्थापना का विचार सर्वप्रथम भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन.भगवती द्वारा दिया गया था।
  • सबसे पहली लोक अदालत का आयोजन 1982 में गुजरात में किया गया था। 2002 से लोक अदालतों को स्थायी बना दिया गया।
  • संविधान के संविधान के भाग-4 में स्थित राज्य के  नीति निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 39A के आधार पर ‘विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987’ पारित किया गया तथा इसके तहत ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA)’ का गठन किया गया। इस प्राधिकरण को लोक अदालतें आयोजित कराने की शक्ति दी गई।

कौन से मामले सुने जाते हैं लोक अदालत में ?

  • लोक अदालतों में सभी दीवानी मामले, वैवाहिक विवाद, नागरिक मामले, भूमि विवाद, मज़दूर विवाद, संपत्ति बँटवारे संबंधी विवाद, बीमा और बिजली संबंधी आदि विवादों का निपटारा किया जाता है।
  • विधि के तहत ऐसे अपराध जिनमें राजीनामा नहीं हो सकता तथा ऐसे मामले जहाँ संपत्ति का मूल्य एक करोड़ रुपए से अधिक है, का निपटारा लोक अदालतों में नहीं हो सकता।
  • लोक अदालतों में किसी भी प्रकार की कोर्ट फीस नहीं लगती। यदि न्यायालय में लंबित मुकदमे में कोर्ट फीस जमा करा दी गई हो तो लोक अदालत में विवाद का निपटारा हो जाने पर वह फीस वापस कर दी जाती है।
  • इसमें दोनों पक्षकार जज के साथ स्वयं अथवा अधिवक्ता के माध्यम से बात कर सकते हैं, जो कि नियमित अदालत में संभव नहीं होता है।
  • लोक अदालतों द्वारा ज़ारी किया गया अवार्ड (पंचाट) दोनों पक्षों के लिये बाध्यकारी होता है। इसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती।

Related Posts

Leave a Reply