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Daily Current Affairs : 1 December 2020

समारोह/सम्मेलन
हॉर्नबिल फेस्टिवल-2020
चर्चा में क्यों?
1 से 10 दिसंबर
हर साल 1 दिसंबर से 10 दिसंबर तक भारत के नागालैंड राज्य में 21 वें हार्नबिल महोत्सव आयोजित होने जा रहा है।
महत्वपूर्ण बिंदु
नगालैंड राज्य के स्थापना दिवस (1 दिसंबर, 1963) के अवसर पर हर साल 10 दिवसीय हॉर्नबिल महोत्सव ( Hornbill Festival) का आयोजन किया जाता है।
इस उत्सव का आयोजन राज्य पर्यटन और कला एवं संस्कृति विभाग (State Tourism and Art & Culture Department) द्वारा किया जाता है।
यह सांस्कृतिक महोत्सव नृत्य, संगीत और पारंपरिक भोजन के साथ-साथ वर्षों से अपनाई गई नगा समुदाय की समृद्ध संस्कृति एवं परंपराओं का कलात्मक प्रदर्शन है, जो कि नगा समाज की विविधताओं को प्रदर्शित करता है।
हार्नबिल एक पक्षी है इसी के नाम पर हॉर्नबिल फेस्टिवल मनाया जाता है। इस पक्षी को हिंदी में धनेश कहा जाता है।
नागालैंड की राजधानी कोहिमा है लेकिन यह उत्सव कोहिमा से 12 किलोमीटर की दूरी दक्षिण में नागा गावं किसामा में मनाया जाता है।
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राष्ट्रीय परिदृश्य
ब्रू शरणार्थी संकट
चर्चा में क्यों?
त्रिपुरा में ब्रू शरणार्थियों के विस्थापन के विषय पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है।
महत्वपूर्ण बिंदु
त्रिपुरा में इन दिनों ब्रू शरणार्थियों के विस्थापन को लेकर प्रदर्शन हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि सरकार इन्हें स्थायी रूप से त्रिपुरा में बसाने जा रही है, जिसका स्थानीय निवासी उग्र विरोध कर रहे हैं।
ब्रू जनजाति के लोग भारत के ही मूल निवासी हैं।
त्रिपुरा के डोबुरी गांव में बसाना चाहती है सरकार:
ब्रू जनजाति के मूल रूप से मिजोरम के आदिवासी हैं। 1996 में हुई हिंसा के बाद इन्होंने त्रिपुरा के कंचनपुरा ब्लाक के डोबुरी गांव में शरण ली थी।
दो दशक से ज्यादा समय से यहां रहने और अधिकारों की लड़ाई लड़ने के बाद इन्हें यहीं बसाने पर समझौता हुआ है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और ब्रू शरणार्थियों के प्रतिनिधियों ने इस साल जनवरी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब और मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथांगा की मौजूदगी में दिल्ली में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
जनवरी में 600 करोड़ रुपए का पुनर्वास योजना पैकेज जारी करने का ऐलान किया गया।
क्यों विस्थापित हुए हैं ब्रू शरणार्थी?
ब्रू समुदाय मिजोरम का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक आदिवासी समूह है। यह म्यांमार के शान प्रांत के पहाड़ी इलाके के मूल निवासी हैं जो कुछ सदियों पहले म्यांमार से आकर मिजोरम में बसे थे।
इनकी बोली रियांग है, जो तिब्बत-म्यांमार की कोकबोरोक भाषा से मिलती जुलती है। रियांग में ब्रू का अर्थ होता है मानव। इन्हें रियांग भी कहा जाता है।
ब्रू जनजाति मूल रूप से मिजोरम की निवासी है। इनमें से अधिकतम लोग मिजोरम के मामित और कोलासिब जिले में ही बसे थे ।
1996 में ब्रू रियांग और बहुसंख्यक मिजो समुदाय के बीच सांप्रदायिक दंगा हो गया।
हिंसक झड़प के बाद 1997 में हजारों लोग भाग कर पड़ोसी राज्य त्रिपुरा के शिविरों में पहुंच गए थे।
इस विवाद में ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (BNLF) और राजनीतिक संगठन ब्रू नेशनल यूनियन (BNU) उभरकर सामने आए।
एक ओर ये अलग जिले की मांग कर रहे थे। वहीं मिजो एसोसिएशन और मिजो स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने ब्रू समुदाय के लोगों की चुनावों में भागीदारी का विरोध किया। उनका कहना है ब्रू मिजोरम के मूल निवासी नहीं हैं।
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कृषि, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
‘ब्लू टाइड’
चर्चा में क्यों?
महाराष्ट्र के समुद्री तटों पर हाल ही में ‘ब्लू टाइड’ दुर्लभ घटना दिखाई दी।
महत्वपूर्ण बिंदु
हाल ही में महाराष्ट्र में कई तटों पर ब्लू टाइड (Blue Tide) देखे गए हैं।
मुंबई के जुहू, देवगढ़ और रत्नागिरि बीच पर यह ”ब्लू टाइड” नीले रंग की झिलमिलात ी हुई मनमोहक छटा देखी गई है।
दरअसल ‘ब्लू टाइड’ के रूप में जानी जाने वाली यह घटना वैज्ञानिक दृष्टि से काफी दुर्लभ मानी जाती है।
जब फाइटो प्लैंक्टन (सूक्ष्म समुद्री वनस्पति) ज्यादा बड़े हो जाते हैं, तो उनसे एक रसायन निकलता है।
यह ब्लू टाइड इंसानों, मछलियों, शेलफिश और अन्य समुद्री जीवों के लिए हानिकारक होते हैं. हाल ही में कुछ कई तटीय क्षेत्रों में ऐसा देखा गया था।
ब्लू टाइड का क्या होता है असर?
समुद्री वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्म समुद्री वनस्पति को आम तौर पर डाइनोफ्लैगलेट्स के रूप में भी पहचाना जाता है।
इनके प्रोटीन में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के जरिए हल्के रंग का उत्पाद निकलता है। वहीं इससे नीले रंग की तरंगें निकलती हैं, जो एक कोशिकीय सूक्ष्म जीवों के लिए हानिकारक होती हैं।
वैज्ञानिकों के मत के मुताबिक ब्लू टाइड दिखने में भले ही अच्छा लगे, लेकिन ये इंसानों के साथ-साथ मछलियों और शेलफिश जैसे समुद्री जीवों के लिए काफी नुकसानदायक साबित होता है।
इससे पहले भारत में साल 2016 में भी ब्लू टाइड देखा गया था।
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विज्ञान एवं प्रौद्योगकी
हायाबूसा-2 यान
चर्चा में क्यों?
क्षुद्रग्रह से सैंपल लेने गया जापान का ”हायाबूसा-2” यान वापस पृथ्वी पर लौटेगा।
महत्वपूर्ण तथ्य
जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) ने रयगु (Ryugu) से जीवन की उत्पत्ति से पर्दा उठाने वाले नमूने एकत्रित करने के लिए दिसंबर, 2014 में यह अभियान लांच किया था।
छह साल तक चलने वाले इस अभियान का नाम फाल्कन पक्षी पर रखा गया है जिसे जापानी भाषा में हायाबुसा कहा जाता है।
हमारा सौर मंडल कैसे बना इसी खोज के लिए अंतरिक्ष में दूर घूम रहे एक ऐस्टरॉइड रयुगु (Ryugu) पर जापान ने यह स्पेसक्राफ्ट भेजा था।
साढ़े तीन साल की यात्रा के बाद 2018 में यह यान पृथ्वी से 30 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित एस्टरॉयड (क्षुद्रग्रह) रायगु पर पहुंचा था।
2019 में उससे मिट्टी के नमूने और दूसरा डेटा लेकर लौट रहा यह स्पेसक्राफ्ट अब धरती के पास पहुंच रहा है। यह आगामी 6 दिसंबर को दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में इसका कैप्सूल लैंड करेगा।
सैंपल लेने के लिए हायाबुसा 2 ने रयुगु की सतह पर ‘स्मॉल कैरी ऑन इम्पैक्टर’ डिवाइस से ब्लास्ट किया था।
जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) के वैज्ञानिकों का मानना है कि सैंपल, खासकर ऐस्टरॉइड की सतह से लिए गए सैंपल में मूल्यवान डेटा मिल सकता है।
यहां स्पेस रेडिएशन और दूसरे फैक्टर्स का असर नहीं होता है। माकोटो योशिकावा के प्रॉजेक्ट मैनेजर ने बताया है कि वैज्ञानिकों को Ryugu की मिट्टी में ऑर्गैनिक मटीरियल का अनैलेसिस करना है।
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