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यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ गठबंधन सेना का युद्धविराम

यमन में हूती विद्रोहियों से लड़ने वाले सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने कोरोना वायरस के कारण सैन्य अभियान को रोक दिया है, जिसका यूनाइटेड किंगडम ने समर्थन किया है। उल्लेखनीय है कि यमन की संयुक्त राष्ट्र की मान्यता प्राप्त सरकार के अनुरोध पर अरब गठबंधन 2015 से हूती विद्रोहियों से लड़ रहा है।इससे पहले मार्च 2020 में यमन के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रिफिथ्स ने युद्धरत दलों से सैन्य कार्रवाई को रोकने और घातक कोरोना वायरस के प्रकोप का मुकाबला करने के प्रयासों को तेज करने का आग्रह किया था।
कौन हैं हूती विद्रोही, और क्यो छिड़ा है यमन में युद्ध?
1932 में अदन (जिसे अब यमन कहा जाता है) को अंंग्रेजों ने अपने अधिकार में ब्रिटिश भारत का एक प्रांत बनाया गया था। 1937 में अदन को ब्रिटिश भारत से अलग कर दिया गया था और एक औपनिवेशिक कार्यालय को एक क्राउन कॉलोनी के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था, जो कि 1963 तक बनाए रखा गया था। 1990 में उत्तर और दक्षिण यमन को मिलाकर यमन अस्तित्व में आया। उत्तरी यमन पर कुछ वक्त तक ऑटोमन साम्राज्य का अधिकार रहा और दक्षिणी यमन पर क़रीब 130 साल तक ब्रिटेन का अधिकार रहा। दोनों हिस्सों के एक होने के बाद भी अलगाव की भावना ख़त्म नहीं हुई।
2011 में जब लीबिया, ट्यूनीशिया, मिस्र और सीरिया में अरब क्रांति (अरब स्प्रिंग) हुई। गद्दाफी, हुस्नी मुबारक और ट्यूनीशिया के सदर का तख्तापलट किया गया, उस दौरान यमन में भी काफी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। जिसके तहत अली अब्दुल्लाह सालेह को पद छोड़ना पड़ा। उन्होंने उपराष्ट्रपति अब्दरबू हादी को सत्ता सौंप दी। हादी को संयुक्त राष्ट्र अभी भी वैध राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता देता है।
लेकिन, हादी के लिए सरकार चलाना आसान नहीं था। उन्हें सालेह के वफादारों से निपटना था तो अलक़ायदा और इस्लामिक स्टेट (आईएस) के कथित बढ़ते प्रभाव को भी रोकना था। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी मुश्किल बना शिया विद्रोही हूती मूवमेंट। हूती विद्रोहियों ने हादी की कमज़ोरियों का फायदा उठाया और उत्तर और पश्चिम के ज़्यादातर इलाके पर कब्जा कर लिया।
साल 2015 में हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और हादी को सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी।हूती विद्रोहियों ने मोहम्मद अल हूती की अगुवाई वाली सरकार गठन किया लेकिन अंतराष्ट्रीय समुदाय इसके बजाए हादी सरकार को ही यमन की सरकार के तौर पर मान्यता दी।मार्च 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में बने आठ देशों के गठबंधन ने हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ हवाई हमले शुरू कर दिए। इस गठबंधन को अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी मदद मुहैया कराई।
सबके अपने-अपने हित
यमन में इन तमाम देशों के दखल के पीछे इनके अपने हित हैं। सोमालिया में सैन्य ठिकाने नहीं बना सका अमेरिका यमन को विकल्प के तौर पर देखता है। इसके अलावा यमन की रणनीतिक स्थित भी इसकी अहमियत बढ़ा देती है। लाल सागर और हिंद महासागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरूमध्य पर यमन स्थित है। ये इलाका बहुत महत्वपूर्ण है। यहां से दुनिया का दो तिहाई तेल गुजरता है। एशिया से यूरोप और अमरीका जाने वाले जहाज भी जाते हैं। ये व्यापार और शिपिंग के लिए महत्वपूर्ण इलाका है।  सऊदी अरब ने यमन की लाइफ लाइन कहे जाने वाले हुदैदा बंदरगाह की नाकेबंदी की हुई है लेकिन जंग ख़त्म होने के आसार नहीं दिखते। हालांकि सउदी अरब अब इस जंग से बाहर निकलना चाहता है, हो सकता है कोरोना संकट उसे ये मौका दिला दे।

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