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अब जनवरी 2023 से लागू होंगे बासेल-3 मानक

कोरोनावायरस (COVID-19) संकट के कारण देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह से संकट में आ गई है , उससे बैंकों का कामकाज काफी प्रभावित हो रहा है। इस कारण आने वाले दिनों में बैंकिंग व्यवस्था के लिए उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बासेल-तीन (Basel 3 Norms)नियमों के पालन समेत  बैंकों को कई तरह की राहत दी है। जैसे-

  •  बैंकों को किसी भी तरह की अस्थिरता की स्थिति में इस्तेमाल होने वाले विशेष फंड “नेट स्टेबल फंडिंग रेश्यो” (Net Stable Funding Ratio,NSFR) संबंधी मानकों को 1 अक्टूबर 2020 से लागू करने की छूट दे दी है। अभी तक यह मानक इस वर्ष 1अप्रैल 2020 से लागू होना था। NSFR के अंतर्गत  बैंकों को अपनी जमा-पूंजी से अलग रखनी है ताकि अगर कोई बड़ा वित्तीय संकट आए तो इसका इस्तेमाल हो सके।
  • इसी तरह से बैंकों के लिए अलग से कैपिटल कंजर्वेशन बफर (Capital Conservation Buffer, CCB) संबंधी टाइमलाइन को भी  31 मार्च से बढ़ाकर 30 सितंबर 2020 कर दिया गया है। इस छूट के अंतर्गत बैंकों को अपने वर्तमान कारोबार से अतिरिक्त धन अलग कर एक विशेष कोष में फिलहाल नहीं रखना होगा।
  • CCB नियम के अनुसार नकद आरक्षित अनुपात (CRR) के अलावा बैंकों के पास 2.5 प्रतिशत राशि अलग से संरक्षित होनी चाहिए। बैंक अपनी कुल जमा राशि का 4 प्रतिशत अभी नकद आरक्षित अनुपात (CRR) के तौर पर रखते हैं। यदि सीसीबी नियम लागू हो जाता तो उन्हें 2.5 प्रतिशत और राशि अलग से रखनी पड़ती।
  • आरबीआई के इन मानकों के पालन संबंधी समय के आगे बढ़ जाने से बैंकों पर दबाव कम होगा।

अंतर्राष्ट्रीय बासेल-3 मानक , 2023 तक के लिए स्थगित
अंतर्राष्ट्रीय बासेल-3 मानक को भी एक और वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया है। अब यह जनवरी, 2023 से लागू होगा। पहले ये नियम जनवरी, 2022 से लागू होने थे। बासेल समिति की निगरानी संस्था सेंट्रल बैंक गवर्नर्स एंड हेड्स ऑफ सुपरविजन (GHOS) ने कोरोनावायरस के संकट को देखते हुए यह फैसला किया है।  उल्लेखनीय है कि दुनियाभर के बैंकों की वित्तीय स्थिति मजबूत बनाने और उन्हें तात्कालिक जोखिमों से बचाने के लिए बासेल मानकों की शुरुआत हुई थी। वर्ष 2007-08 की वैश्विक आर्थिक मंदी और बैंकों की बुरी हालत के दौरान बासेल-2 मानकों की खामियां खुलकर सामने आईं। इसे देखते हुए बासेल-3 मानक तैयार किए गए, जिसे 2019 में ही लागू हो जाना था। लेकिन इसे जनवरी, 2023 तक के लिए स्थगित कर दिया गया  है। बासेल मानक भारत में भी वर्ष 2013 से चरणबद्ध रुप से लागू किए जा रहे हैं।
क्या हैं बासेल नियम?
बासेल स्विट्ज़रलैंड में एक शहर है, जहाँ अंतर्राष्ट्रीय निपटान ब्यूरो (Bank for International Settlements-BIS) का मुख्यालय भी है।
BIS, केंद्रीय बैंकों के बीच वित्तीय स्थिरता के समान लक्ष्य और बैंकिंग नियमों के आम मानकों के साथ सहयोग को बढ़ावा देता है।
बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति द्वारा बैंकों और वित्तीय प्रणाली के लिये जोखिम पर केंद्रित समझौतों के सेटों को बासेल नियम (Basel Norms) कहा जाता है।
बासेल नियमों के उद्देश्य
बासेल नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दायित्वों को पूरा करने और अप्रत्याशित हानि को सहन करने के लिये वित्तीय संस्थानों के पास पर्याप्त पूंजी होनी चाहिये। भारत ने अपनी बैंकिंग प्रणाली के लिये बासेल नियमों को स्वीकार किया है। अब तक तीन बासेल नियम (1, 2, 3) जारी हो चुके हैं।
बासेल III नियम
बासेल III या बासेल मानकों को 3 दिसंबर 2010 में जारी किया गया था और यह बासेल समझौते की श्रृंखला का तीसरा चरण है। ये समझौते बैंकिंग क्षेत्र में जोखिम प्रबंधन पहलुओं से जुड़े हैं। (बासेल I और बासेल II इसके पूर्व संस्करण थे लेकिन कम कठोर थे)। ये मानदंड 31 मार्च 2015 से कई चरणों में लागू हो चुके हैं लेकिन पूरी तरह से अब जनवरी 2023 से ही लागू हो सकेंगे। बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति के अनुसार, ” बासेल III सुधार उपायों का एक व्यापक सेट है जिसे बासेल समिति ने, बैंकिंग क्षेत्र में विनियमन, पर्यवेक्षण और जोखिम प्रबंधन को मजबूत बनाने के लिए बैंकिंग पर्यवेक्षण पर तैयार किया है।”
बासेल III उपायों का उद्देश्य है–

  • वित्तीय और आर्थिक अस्थिरता से पैदा हुए उतार– चढ़ाव से निपटने में बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता में सुधार लाना।
  • जोखिम प्रबंधन क्षमता और बैंकिंग क्षेत्र के प्रशासन में सुधार लाना।
  • बैंक की पारदर्शिता एवं खुलासे को मजबूत बनाना।
  • वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) की गैर-विधायी सिफारिशों का कार्यान्वयन.
  • निवेशकों को वित्तीय परिसंपत्तियों की समस्त श्रेणियों का एक सिंगल व्यू उपलब्ध कराने के लिए एक रिपोजिटरी स्थापित करने का मुद्दा.
  • बासेल-III विनियमों और पर्यवेक्षीय पूँजीगत अपेक्षाओं को मद्देनजर रखते हुए अगले पाँच वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र की पूंजीगत आवश्यकताएँ सुझाने के उपाय.
  • साथ ही, इसमें वित्तीय क्षेत्र के लिए एक कारगर समाधान तंत्र स्थापित करने के उपायों पर भी विचार किया.

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