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कोरोना वायरस के कारण संकट में आई कंपनियां ले रहीं हैं 'एक्ट ऑफ गॉड' का सहारा

कोरोना के कारण संकट झेल रही भारतीय कंपनियां नुकसान से बचने के लिए अब ‘एक्ट ऑफ गॉड’ (Act Of God) का सहारा ले रही हैं। सैकड़ों कंपनियों ने एक्ट ऑफ गॉड प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए माल-सेवा की क्रय-विक्रय, आपूर्ति का समझौता पूरा करने या बकाया चुकाने से हाथ खड़े कर दिए हैं।भारत के कई बड़े उद्योग समूहों ने इसी प्रावधान के तहत लाइसेंस फीस, किराया या आपूर्ति करने से इनकार कर दिया है। एलपीजी कंपनियों ने भी मांग में कमी को देखते हुए कतर से सौदे में तय मात्रा जितनी गैस खरीदने से मना कर दिया है।
एक्ट ऑफ गॉड क्या है?
लैटिन शब्द फोर्स मेज्योर (Force Majeure) या एक्ट ऑफ गॉड किसी कानूनी समझौते का एक प्रावधान है। युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं (तूफान, बाढ़, ज्वालामुखी, आग) जिन्हें हम भगवान की लीला यानी एक्ट ऑफ गॉड कहते हैं, के समय इसका सहारा लेकर कोई पक्ष कांट्रैक्ट को पूरा न कर पाने की मजबूरी जता सकता है। इससे वे जुर्माना, प्रतिबंध या कानूनी शिकंजे से बच सकते हैं। हालांकि कच्चा माल महंगा होने या ऐसे किसी व्यापारिक नुकसान के समय इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं कर सकते। 2015 में इबोला महामारी के दौरान इस प्रावधान का इस्तेमाल हुआ था। हालांकि कोर्ट ने इसे एक्ट ऑफ गॉड नहीं माना। दरअसल 2015 में पश्चिमी अफ्रीका के देशों में इबोला फैल गया था। मोरक्को को दो साल पर आयोजित होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट की उस साल मेजबानी करनी थी। लेकिन मोरक्को की सरकार ने एक्ट ऑफ गॉड या फोर्स मैज्योर का हवाला देते हुए टूर्नामेंट रद्द कर दिया। लेकिन कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट ने मोरक्को के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि इबोला फोर्स मैज्योर की श्रेणी में नहीं आता है क्योंकि उस खतरनाक वायरस ने मेजबानी को असंभव नहीं बनाया था। मोरक्को को टूर्नामेंट रद्द करने का दोषी ठहराया गया और 1 मिलियन डॉलर जुर्माना लगाया गया। अगर इबोला को फोर्स मैज्योर मान लिया जाता तो मोरक्को को अपनी जिम्मेदारी से बचने का दोषी नहीं माना जाता।

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